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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में कुर्मी वोटर होंगे निर्णायक!
यूपी में सभी राजनैतिक दल पिछड़ों (ओबीसी) की बड़ी जाति कुर्मियों के वोट बैंक पर नज़र जमाएं हुए हैं। कुर्मियों के वर्चस्व के चलते राजनीति में भी कुर्मी नेताओं ने अहम स्थान और किरदार निभाया है, यह और बात है कि अभी तक प्रदेश को कुर्मी बिरादरी से कोई मुख्यमंत्री नहीं मिल पाया है। इस बार भी हमेशा की तरह उत्तर प्रदेश की सियासत ओबीसी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई है। प्रदेश में यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी आबादी ओबीसी में कुर्मी समाज की है। कुर्मी समाज के वोटों को साधने के लिए बीजेपी से लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस तक जोर आजमाइश में जुटी हैं। वहीं, अपना दल के दोनों गुट कुर्मी समाज की बदौलत किंग मेकर बनने का सपना संजोय हैं तो नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) भी इसी दम पर सूबे में अपने सियासी पैर जमाना चाहती है। ऐसे में यूपी चुनावों में सभी दलों के लिए अहम बन चुके कुर्मी मतदाता किसकी वैतारणी पार लगाएंगे? यह सवाल सत्ता के गलियारों में खूब गूंज रहा है। उत्तर प्रदेश में कुर्मी बिरादरी का वोट करीब 6 फीसदी है, जिन्हें पटेल, गंगवार, सचान, कटियार, निरंजन, चौधरी और वर्मा जैसे उप-नाम से जाना जाता है। रुहेलखंड में कुर्मी गंगवार और वर्मा से पहचाने जाते हैं तो कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में कुर्मी, पटेल, कटियार, निरंजन और सचान कहलाते हैं। अवध और पश्चिमी यूपी के क्षेत्र में कुर्मी समाज के लोग वर्मा, चौधरी और पटेल नाम से जाने जाते हैं। प्रदेश में रामपूजन वर्मा, रामस्वरुप वर्मा, बरखू राम वर्मा, बेनी प्रसाद और सोनेलाल पटेल यूपी की कुर्मी राजनीति के दिग्गज नेता माने जाते थे।
यूपी में कुर्मी समाज 6 फीसदी है, जो ओबीसी में 35 फीसद के करीब है। सूबे की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटें और 8 से 10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कुर्मी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यूपी में कुर्मी समाज का प्रभाव 25 जिलों में हैं, लेकिन 16 जिलों में 12 फीसदी से अधिक सियासी ताकत रखते हैं। कुर्मी बिरादरी के लोग पूर्वांचल से लेकर बुदंलेखंड और अवध से रुहेलखंड तक में किसी भी दल का सियासी खेल बनाने और बिगाड़ने की स्थिति रखते है। हाल फिलहाल में भारतीय जनता पार्टी कुर्मी समाज पर पुरजोर तरीके से पकड़ बनाए हुए है। सपा ने भी कुर्मी समाज के वोटरों को लुभाने के लिए गहरी गोटें बिछाई हैं। कांग्रेस भी बार-बार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को यूपी लाकर संकेत दे रही है कि कुर्मी वोटर उनके लिए कितना महत्व रखती है। बड़े दलों में कुर्मी नेताओं की बात कि जाए तो समाजवादी पार्टी ने नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है तो भाजपा में स्वतंत्र देव सिंह कुर्मियों की रहनुमाई कर रहे हैं। अबकी विधान सभा चुनाव में कुर्मी किसका बेड़ा पार करेगा,यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
बहरहाल, आजादी के बाद से कुर्मी वोटर सभी दलों को लुभाते रहे हैं। एक समय में कांग्रेस में कुर्मियों का बड़ा नेतृत्व रहा था। प्रयागराज में रामपूजन पटेल कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे। वह 1967 व 1970 में दो बार विधायक बने। बाद में सितम्बर 1981 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वह फूलपुर संसदीय क्षेत्र का चार बार नेतृत्व करते रहे। बाद में 1989 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने को लेकर कांग्रेस छोड़ दी और सपा में आ गए। मंडल दौर ने कांग्रेस से इस बड़े वोट बैंक को धीरे-धीरे दूर कर दिया। अब पूर्वांचल में सैंथवार कुर्मियों की विरासत संभाल रहे कद्दावर नेता आरपीएन सिंह भी कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा में आ गए।
रूहेलखंड और उसमें भी बरेली को कुर्मी राजनीति का बड़ा ठिकाना माना जाता है। यहां 14 फरवरी को मतदान होना है। चाहे चेतराम गंगवार हों या भगवत शरण गंगवार या संतोष कुमार गंगवार बरेली, बहेड़ी और नवाबगंज से लेकर पीलीभीत तक कुर्मियों का वर्चस्व है। चेतराम वर्ष 1967 में बरेली की नवाबगंज सीट से जीते और नारायण दत्त तिवारी व वीर बहादुर सिंह की सरकार में मंत्री रहे थे। नवाबगंज सीट ऐसी है जहां से 52 वर्षों में किसी कुर्मी के अलावा कोई विधायक ही नहीं चुना गया है। यही वजह है कि नवाबजंग से भाजपा के डा. एमपी आर्य, सपा के भगवत शरण गंगवार, कांग्रेस की ऊषा गंगवार मैदान में हैं तो बहेड़ी से राजस्व राज्यमंत्री छत्रपाल सिंह गंगवार और बसपा के आसेराम गंगवार मैदान में हैं। बरेली जिले में बार-बार जीतते रहे कुर्मी नेताओं की अपने समाज के बीच कितनी पकड़ है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र के कुर्मी नेता लगातार और बार-बार जीतते रहे है, संतोष गंगवार 8 बार सांसद बने हैं तो नवाबगंज से कभी भाजपा के नेता रहे भगवत शरण गंगवार पांच बार विधायक रहे हैं। खीरी निघासन से राम कुमार वर्मा विधायक रहे और मंत्री बने। बाल गोविंद वर्मा दो बार सांसद रहे। उनकी पत्नी ऊषा वर्मा भी सांसद रहीं। उनके बेटे रविप्रकाश वर्मा भी सांसद रहे। राम कुमार वर्मा का बेटा शशांक अब निघासन से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं।
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