होम कोरोना संकट: नए नोट छापकर क्या भारत की अर्थव्यवस्था सुधारी जा सकती है?
कोरोना संकट: नए नोट छापकर क्या भारत की अर्थव्यवस्था सुधारी जा सकती है?
कोविड महामारी की वजह से तबाह हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के उपायों पर लगातार चर्चा हो रही है लेकिन जिस उपाय को लेकर सबसे ज्यादा मतभेद है, वह है रिज़र्व बैंक को और नोट छापने चाहिए या नहीं.
अर्थव्यवस्था में संतुलन लाने के लिए कई बार मौद्रिक उपाय किए जाते हैं, अधिक नोट छापने को तकनीकी भाषा में 'क्वॉन्टिटेटिव इज़ींग' कहते हैं, मोटे तौर पर इसका मतलब है मुद्रा की उपलब्धता को बढ़ाना.
दुनिया के कई देशों में इस तरीके को अपनाया गया है, अमेरिका का फ़ेडरल रिज़र्व इस तरीके का इस्तेमाल हाल के वर्षों में कामयाबी के साथ कर चुका है, लेकिन वेनेज़ुएला और ज़िम्बॉब्वे जैसे देशों में इसके बहुत ही घातक परिणाम हुए हैं.
पिछले हफ़्ते देश के शीर्ष बैंकरों में से एक उदय कोटक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर से तबाह हुई अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए नोट छापने की जरूरत है.
भारत में नोट छापने की ज़िम्मेदारी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) की है और इस प्रक्रिया में सरकार की सलाह भी शामिल होती है.
आर्थिक विकास
कोटक महिंद्रा बैंक के सीईओ का तर्क था कि नोट छापने के काम को दो स्तरों पर करने की ज़रूरत है. पहला, अर्थव्यवस्था के निचले तबके के लिए और दूसरा महामारी से प्रभावित क्षेत्रों में नौकरियों की सुरक्षा के लिए.
उनका कहना था, "मेरे विचार में, यह सरकार की बैलेंस शीट के विस्तार करने का समय है, जिसमें आरबीआई मदद कर सकता है. मौद्रिक विस्तार या पैसे की छपाई के लिए कुछ करें, अगर अब नहीं तो कब?"
आरबीआई के अधिकारियों के मुताबिक, गवर्नर शक्तिकांत दास फ़िलहाल मुद्रा छापने की ज़रूरत नहीं महसूस करते हैं, कुछ लोगों की सोच ऐसी ज़रूर है लेकिन शक्तिकांत दास के अनुसार, ऐसा करने से महँगाई बढ़ने का डर है जिससे आर्थिक विकास को क्षति पहुँच सकती है.
रिज़र्व बैंक से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, "बहुत अधिक मुद्रा आपूर्ति मुद्रास्फीति को बढ़ाएगी. इसके अलावा अगर सरकार नोट छापने पर विचार करती है तो मुद्रा और ऋण बाजार दोनों में अनिश्चितता आएगी, मुद्रा का बड़े पैमाने पर अवमूल्यन होगा."
आर्थिक दुनिया विभाजित
बाज़ार में रिज़र्व से छपकर अचानक बड़ी मात्रा में नकदी के आने से कीमतें बढ़ने का ख़तरा और मुद्रा के वास्तविक मूल्य में गिरावट यानी अवमूल्यन का ख़तरा अक्सर व्यक्त किया जाता है, लेकिन कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आम हालात में यह बात ठीक है, लेकिन इस समय देश आम हालात से नहीं गुज़र रहा है.
मुद्रा छापने को लेकर आर्थिक जगत विभाजित है. अर्थव्यवस्था की हालत इतनी ख़राब है कि कई विशेषज्ञ कहते हैं कि आरबीआई के लिए मुद्रा छापने का ये सही समय है. कुछ दूसरे विशेषज्ञ तर्क ये देते हैं कि मार्केट में लिक्विडिटी (नक़दी) की कमी नहीं है, इसलिए अतिरिक्त नोट छापकर महंगाई बढ़ने का खतरा मोल नहीं लिया जाना चाहिए.
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