होम अंबेडकर जयंती 2020: आज मंदी दौर में बाबा साहेब का आर्थिक ज्ञान कई अर्थशास्त्रियों के लिए प्रेरणा
अंबेडकर जयंती 2020: आज मंदी दौर में बाबा साहेब का आर्थिक ज्ञान कई अर्थशास्त्रियों के लिए प्रेरणा
भारतीय संविधान के पिता और दलितों के नेता के रूप में जाने जाने वाले बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने एक अर्थशास्त्री के रूप में अपना करियर शुरू किया था. बाबा साहेब का आर्थिक ज्ञान आज भी कई आर्थिक बहसों में महत्वपूर्ण योगदान देता है. वह वास्तव में भारत में अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित अर्थशास्त्रियों में से थे, जिन्होंने अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से एक डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी. अंबेडकर की लंदन डॉक्टोरल थीसिस बाद में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित की गई.
डॉ. अंबेडकर ने अंग्रेज़ सरकार की तत्कालीन टैक्स पालिसी भूमि लगान, कस्टम डियूटी, जागीरदारी व्यवस्था द्वारा किसानों का आर्थिक शोषण की की आलोचना की. अंबेडकर का कहना था कि भारतीय रुपए का आधार सोना होना चाहिए चांदी नहीं. उन्होंने गोल्ड स्टैंडर्ड की भी वकालत की थी.
उनका शोध विषय Evolution of Public Finance in British India और डी एस सी का विषय Problem of the Rupee था, जो पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुए हैं. अंबेडकर ने जॉन मेनार्ड केन्स के सुझाव के विपरीत एक गोल्ड स्टैंडर्ड के पक्ष में तर्क दिया कि भारत को एक गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड अपनाना चाहिए. अंबेडकर का कोलंबिया निबंध राज्य-केंद्र के वित्तीय संबंधों पर था. भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए 1925 में गठित हिल्टन कमीशन के सामने उन्हें अपनी राय रखने के लिए बुलाया गया था.
अंबेडकर द्वारा लिखे Responsibilities of a Responsible Government के बारे में विद्वान प्रो हेराल्ड जे लस्की ने कहा " लेख में प्रकट किये गए डॉ अम्बेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप के हैं." अंबेडकर के आर्थिक दर्शन पर नोबल विजेता डॉ अमर्त्य सेन ने कहा है " डॉ आंबेडकर मेरे अर्थशास्त्र के जनक हैं." एक लेख में कहा गया है कि रुपए का मूल्य पौंड के हिसाब से 1 शिलिंग 4 पैन्स या 1 शिलिंग 6 पैन्स रखा जाये. इस विषय पर आंबेडकर ने दो लेख लिखे. उन्होंने लिखा रुपए का मूल्य 1 शिलिंग 6 पैन्स रखना ही राष्ट्र के लिए सही होगा. उनकी इस राय के कारण ही रुपए का मूल्य 1 शिल्लिग 6 पेन्स रखा गया.
डॉ अंबेडकर का राजनीतिक दर्शन मूलत: सामाजिक- आर्थिक दर्शन माना जाता है. एक लेख के अनुसार उन्होंने कहा "बेरोजगार लोगों से पूछिये कि उनके लिए मौलिक अधिकारों की क्या उपयोगिता है. यदि किसी बेरोजगार व्यक्ति को अनिश्चित घंटों वाली सवैतनिक नौकरी और किसी मजदूर यूनियन में शामिल होने, संगठन बनाने अथवा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बीच चुनने के लिए कहा जाये तो क्या उसके चुनाव के बारे में कोई शक हो सकता है?''
उन्होंने लिखा ''वह दूसरी चीज़ कैसे चुन सकता है? भुखमरी, घर-विहीनता, दरिद्रता, बच्चों को स्कूल से दूर रखने जैसी परिस्थितियां किसी भी व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकार छोड़ने के लिए बाध्य कर सकती हैं. इस प्रकार बेरोजगार लोग काम तथा जीवन-निर्वाह के लिए मौलिक अधिकारों को तिलांजलि देने के लिए मजबूर होंगे.
Leave A comment
महत्वपूर्ण सूचना -
भारत सरकार की नई आईटी पॉलिसी के तहत किसी भी विषय/ व्यक्ति विशेष, समुदाय, धर्म तथा देश के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी दंडनीय अपराध है। इस प्रकार की टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई (सजा या अर्थदंड अथवा दोनों) का प्रावधान है। अत: इस फोरम में भेजे गए किसी भी टिप्पणी की जिम्मेदारी पूर्णत: लेखक की होगी।