होम टल सकते हैं तो टाल दें विधानसभा चुनाव क्योंकि जान है तो जहान है
टल सकते हैं तो टाल दें विधानसभा चुनाव क्योंकि जान है तो जहान है
वर्ष 2022 की प्रथम तिमाही में पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर व पंजाब के विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ रही हैं साथ ही ओमिक्रोन का संकट भी गहराता जा रहा है। देश में कोरोना संक्रमण की संभावित इस ओमिक्रोन लहर की आशंका को देखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री शेखर यादव ने प्रधानमन्त्री से अपील की थी कि वह इन चुनावों को कुछ समय आगे बढ़ाने के बारे में विचार करें। न्यायालय की इस अपील को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, इसे जबर्दस्ती राजनीतिक विषयों में न्यायालय का हस्तक्षेप भी कहा जा जा रहा है, लेकिन जन-जन की जीवन रक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़ा मामला होने की वजह से न्यायालय का दखल अनुचित भी नहीं कहा जा सकता। यह तो तय है कि किसी भी राज्य में चुनाव कराने का फैसला केवल चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में ही आता है और आयोग ही तय करता है कि किसी भी विधानसभा की पांच साल की अवधि समाप्त होने से पहले चुनाव किस समय कराये जाने चाहिए, जिससे नई विधानसभा का गठन समय रहते हो सके।
ताजा निर्णय के अनुसार विधानसभा चुनाव नहीं टाले जायेंगे। चुनाव आयोग की स्वास्थ्य सचिवों के साथ ओमिक्रोन के बढ़ते संकट की स्थिति पर हुई बैठक के बाद यह निर्णय सामने आया है। लेकिन न्यायालय की अपील को लेकर चर्चा का बाजार गर्म है, राजनीतिक नफे-नुकसान की बातें हो रही हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि हार के डर से आशंकित होकर भाजपा चुनाव को टालना चाहती है। लेकिन सच तो यह है कि चुनावी सभाओं और रैलियों में उमड़ रही भीड़ कोरोना के नये संकट के फैलने का बड़ा कारण बन सकता है, इस संकट की चिन्ता चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है। राज्य सरकारों एवं संबंधित विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों को इस पर ध्यान देना ही चाहिए कि कहीं चुनाव प्रचार से जुड़ी गतिविधियों के कारण कोरोना अनियंत्रित तो नहीं होगा? इसके लिये लगातार निगरानी और समीक्षा भी की जानी चाहिए।
वैसे कोरोना की तीसरी लहर की संभावना राज्यों की सीमाओं को तोड़ कर अखिल भारतीय स्तर पर व्यक्त की जा रही है। लेकिन यह सर्वथा उचित कदम होगा कि चुनाव वाले राज्यों में टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाई जाये। जरूरत पड़ने पर चुनाव रैलियों एवं सार्वजनिक चुनाव सभाओं के स्थान पर प्रचार के अन्य माध्यमों का प्रयोग किया जाये, जैसे समाचार पत्रों में विज्ञापन, रेडियो, टीवी के माध्यम से जन-संबोधन। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हम देख चुके हैं कि किस प्रकार यह संक्रमण बहुत तेजी के साथ फैला था। उस समय प. बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो आयोग ने रैलियों जैसे आयोजनों के बारे में संशोधनात्मक दिशा-निर्देश दिये थे और मतदान केन्द्रों से लेकर मतों की गिनती होने तक के प्रबन्धन को कोरोना अनुरूप व्यवहार से बांध दिया था। इस बार भी ऐसी व्यवस्थाएं अपेक्षित हों तो करनी ही चाहिए। जो भी राजनीतिक दल ओमिक्रोन को गंभीर खतरा नहीं बताते हुए इसे भाजपा का चुनावी हथकंडा करार दे रहे हैं, यह उनका संकीर्ण एवं स्वार्थपूर्ण राजनीतिक नजरिया है।
हालांकि अभी तक ओमिक्रोन विदेशों की तुलना में भारत में नियंत्रित है, नये कोरोना वेरियंट की भयावहता के बारे में अभी तक चिकित्सा वैज्ञानिक स्पष्ट कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं सिवाय इसके कि यह पिछले वेरियंटों के मुकाबले तीन गुणा गति से फैलता है। इसे देखते हुए ही चुनाव आयोग ने स्वास्थ्य मन्त्रालय से मन्त्रणा करने के बाद निर्णय लिये हैं। दरअसल कोरोना का मुद्दा राजनीति से हट कर है और इस पर किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए। मगर यह भी जरूरी है कि चुनाव आयोग को सभी प्रमुख राजनैतिक दलों को बुला कर उनकी राय भी लेनी चाहिए क्योंकि अन्ततः ये राजनैतिक दल ही चुनाव लड़ते हैं।
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