होम सस्ते ड्रोन बनाम महंगे फाइटर जेट, F-35 और राफेल जैसे हथियारों को चुनौती, ईरान ने कैसे बदल दिए जंग के नियम?
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष में ईरान ने जिस रणनीति का इस्तेमाल किया है, उसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष में ईरान ने जिस रणनीति का इस्तेमाल किया है, उसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब तक F-35, F-22 जैसे स्टेल्थ फाइटर जेट और THAAD, Patriot, Iron Dome जैसी अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियां युद्ध के सबसे प्रभावी हथियार मानी जाती थीं। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि केवल महंगे और उन्नत हथियारों के सहारे युद्ध जीतना संभव नहीं है।
ईरान ने सस्ते ड्रोन स्वार्म और उन्नत मिसाइलों के जरिए यह दिखाया कि कम लागत वाले हथियार भी रणनीतिक रूप से भारी पड़ सकते हैं।
F-35 Lightning II और F-22 Raptor जैसे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके में घुसकर मिशन पूरा करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि इनकी तैनाती और सुरक्षा पर भारी खर्च आता है।
नई सेंसर तकनीक, नेटवर्क आधारित निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के कारण इनकी पहचान संभव होने लगी है, जिससे इनकी अजेयता पर सवाल खड़े हुए हैं।
ईरान द्वारा इस्तेमाल किए गए Shahed 136 वन-वे अटैक ड्रोन ने युद्ध की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई। सैकड़ों की संख्या में छोड़े गए इन ड्रोन ने उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बना दिया।
इसी तरह MQ-9 Reaper जैसे ड्रोन भी आधुनिक युद्ध में प्रभावी साबित हुए हैं, हालांकि ये महंगे और सीमित संख्या में उपलब्ध होते हैं।
THAAD, Patriot, Iron Dome और David's Sling जैसे सिस्टम एक-एक मिसाइल को रोकने में भारी लागत खर्च करते हैं।
इसके विपरीत, हमलावर देश अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन और मिसाइलों की बौछार कर इन महंगे सिस्टम को आर्थिक रूप से थका सकता है। यही रणनीति इस संघर्ष में चर्चा का विषय बनी।
भारत के पास S-400, Akash-NG और Prithvi Air Defence जैसे मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम हैं। इसके अलावा ब्रह्मोस, रुद्रम और अग्नि जैसी मिसाइलें भारत की सामरिक ताकत का हिस्सा हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स और स्वदेशी ड्रोन उत्पादन पर तेजी से काम करना होगा। DRDO का ‘सूर्या’ कार्यक्रम इसी दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है।
इस संघर्ष ने यह भी दिखाया कि समुद्री शक्ति कितनी अहम है। अमेरिका की Virginia-class submarine जैसी परमाणु पनडुब्बियां लंबी दूरी से छिपकर हमले कर सकती हैं। भारत को अपनी न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) क्षमता मजबूत करने की जरूरत बताई जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—रणनीति, संख्या और तकनीकी नवाचार कभी-कभी महंगे और पारंपरिक हथियारों पर भारी पड़ सकते हैं। आधुनिक युद्ध केवल ताकत का नहीं, बल्कि लागत, तकनीक और चतुर रणनीति का भी खेल बन चुका है।
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