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समाचारदेशराजनीति Alert Star Digital Team May 5, 2026 06:39 PM

83 साल बाद बंगाल में बदली सियासत की धुरी, हिंदुत्व की वापसी के पीछे क्या है पूरा गेम प्लान?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के चुनाव नतीजों ने एक ऐतिहासिक मोड़ ला दिया है। 1941 में फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा के गठबंधन से शुरू हुई हिंदुत्व की राजनीति अब 83 साल बाद फिर सत्ता के शिखर पर पहुंच गई है।

83 साल बाद बंगाल में बदली सियासत की धुरी, हिंदुत्व की वापसी के पीछे क्या है पूरा गेम प्लान?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के चुनाव नतीजों ने एक ऐतिहासिक मोड़ ला दिया है। 1941 में फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा के गठबंधन से शुरू हुई हिंदुत्व की राजनीति अब 83 साल बाद फिर सत्ता के शिखर पर पहुंच गई है। उस समय बनी 'प्रोग्रेसिव कोएलिशन' सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्त मंत्री थे और यह सरकार 1943 तक चली थी। इसके बाद लंबे समय तक कांग्रेस, वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, लेकिन अब बीजेपी की जीत के साथ राजनीतिक चक्र पूरा होता नजर आ रहा है।

हिंदुत्व की वापसी के पीछे कई बड़े कारण

इतने लंबे अंतराल के बाद हिंदुत्व की राजनीति की वापसी किसी एक वजह का परिणाम नहीं है, बल्कि कई सामाजिक और राजनीतिक कारकों का मेल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने की ‘आत्मा की शांति’ से जोड़ा है।

हिंदू वोटों का बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण

बीजेपी की जीत में सबसे अहम भूमिका हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण ने निभाई। पार्टी ने जाति और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर एक व्यापक हिंदू वोट बैंक तैयार किया। 2021 से 2026 के बीच बीजेपी का वोट शेयर करीब 7 प्रतिशत बढ़ा, जबकि तृणमूल कांग्रेस का लगभग उतना ही घटा। राज्य के हर दसवें हिंदू मतदाता का झुकाव टीएमसी से हटकर बीजेपी की ओर गया। पार्टी नेताओं के मुताबिक, हिंदू महिलाओं और आदिवासी समुदायों का समर्थन इस जीत की मजबूत नींव बना।

RSS का व्यापक जमीनी अभियान

इस बदलाव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लंबे समय से चल रही रणनीति भी अहम रही। संघ ने जातिगत विभाजन को कम करने और साझा हिंदू पहचान को मजबूत करने के लिए राज्य के 243 विधानसभा क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक ‘लोकमत परिष्कार’ बैठकों का आयोजन किया। इन अभियानों में 14 सहयोगी संगठनों ने भाग लिया। रामनवमी जैसे त्योहारों को सामूहिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया और चुनाव को ‘अस्तित्व की लड़ाई’ के तौर पर प्रचारित किया गया।

बाहरी घटनाओं का असर

बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट और वहां हिंदुओं पर कथित अत्याचारों की खबरों ने सीमावर्ती इलाकों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया। साथ ही जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव को लेकर उठी चिंताओं ने भी हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने में भूमिका निभाई।

बंगाल की राजनीति और संस्कृति पर संभावित असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह जीत दर्शाती है कि बीजेपी का हिंदुत्व मॉडल अब बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक सोच में भी जगह बना चुका है। तृणमूल कांग्रेस पर ‘हिंदू-विरोधी’ और ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति के आरोपों को चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति सफल होती दिखी है। इस परिणाम के साथ पूर्वी भारत में बीजेपी का प्रभाव और मजबूत हो गया है, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ेगा असर

बिहार, ओडिशा और असम के बाद अब बंगाल में भी बीजेपी की सरकार बनने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का ‘मिशन ईस्ट’ मजबूत हुआ है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर हिंदुत्व आधारित राजनीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। यह मॉडल भविष्य में अन्य राज्यों के चुनावों में भी प्रभाव डाल सकता है।

नागरिकता और जनसांख्यिकी पर नई बहस

चुनाव के दौरान मतदाता सूचियों में SIR प्रक्रिया के तहत 91 लाख नाम हटाए जाने का मुद्दा भी चर्चा में रहा। अमित शाह के घुसपैठियों को हटाने संबंधी बयान ने नागरिकता और अवैध प्रवासन के सवाल को फिर से केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति का प्रमुख एजेंडा बन सकता है।

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