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जितिन प्रसाद के आने से बीजेपी को क्या हासिल होगा?
कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के बीजेपी में शामिल होने के बाद से एक नया सवाल खड़ा हो गया है.
सवाल ये है कि इस राजनीतिक घटनाक्रम से किसका फायदा और किसका नुकसान होगा.
फिलहाल राजनीतिक विश्लेषक जितिन प्रसाद के फायदे या नुकसान पर कम और बीजेपी और कांग्रेस के फायदे-नुकसान पर ज्यादा बात कर रहे हैं.
कई राजनीतिक विश्लेषक इसे कांग्रेस के लिए बड़ा धक्का बताते हुए कह रहे हैं कि अब वो समय आ गया है जब गाँधी परिवार को गंभीरता से सोचना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी को बिखरने से कैसे बचाया जाए.
वहीं, कुछ लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जितिन प्रसाद के बीजेपी में जाने पर अतिरिक्त उत्साह दिखाया जा रहा है क्योंकि प्रसाद के कहीं जाने-आने से ज़मीनी राजनीतिक में बड़ा बदलाव नहीं आएगा.
कांग्रेस पार्टी की नाराज़गी
कांग्रेस पार्टी में बड़े नेताओं से लेकर प्रदेश शाखाओं के ट्विटर हैंडल से जितिन प्रसाद के प्रति नाराज़गी जताई गई है.
राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है, "जितिन प्रसाद एक पारंपरिक कांग्रेसी थे. हमने उन्हें सम्मान दिया और उन्हें अनदेखा नहीं किया. वह महासचिव थे, बंगाल में इन-चार्ज थे. और हर बार चुनाव लड़ने की अनुमति पाते रहे. इसके बावजूद अगर वह कांग्रेस और विचारधारा पर आरोप लगाते हैं, जिसके लिए वह खुद और उनके पिता ने काम किया और लड़ाई की, तो ये दुख की बात है."
वहीं, शीर्ष कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, "जितिन प्रसाद बीजेपी में शामिल हुए. सवाल ये है कि क्या उन्हें बीजेपी से "प्रसाद" मिलेगा या वह यूपी चुनाव के लिए बीजेपी के एक नये 'शिकार' हैं. इस तरह की डीलों में अगर विचारधारा की जगह नहीं है तो बदलाव आसान है."
कांग्रेस पार्टी की राज्य शाखाओं के ट्विटर हैंडलों पर जितिन प्रसाद के प्रति स्पष्ट रूप से नाराज़गी और गुस्से का इज़हार किया गया है.
मध्य प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल पर लिखा गया कि जितिन प्रसाद के जाने से कांग्रेस खुश है - "यह एक कूड़ा कूड़ेदान में डालने जैसी सामान्य प्रक्रिया है."
हालांकि, बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया.
जितिन प्रसाद ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा. सभी आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हैं. जिनकी सोच छोटी है, वो हमेशा छोटी रहेगी. मैं सभी की आलोचना को प्रसाद की तरह ले रहा हूं. मुझे विश्वास है कि मेरा फैसला सही है और देश हित में है."
राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर देखें तो एक सवाल अभी भी मौजूद है कि जितिन प्रसाद के बीजेपी में जाने और कांग्रेस छोड़ने से दोनों पार्टियों पर क्या असर पड़ेगा.
ज़मीन पर किसके लिए क्या बदलेगा?
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां की राजनीति में ब्राह्मण वोट बैंक की अपनी अहमियत रही है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से ये मान्यता रही है कि ब्राह्मणों को साथ लेकर राज्य की सत्ता हासिल की जा सकती है.
राजनीतिक विश्लेषक मायावती से लेकर अखिलेश यादव तक को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने का श्रेय ब्राह्मण वोट बैंक को देते रहे हैं.
इसी से समझा जा सकता है कि बीजेपी, सपा और बसपा ब्राह्मणों को अपने साथ लाने के लिए ब्राह्मण मंच से लेकर परशुराम की मूर्ति लगवाने जैसे वादे करते रहे हैं. संख्या बल की दृष्टि से भी ब्राह्मण समाज को मजबूत माना जाता है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक संजय कुमार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण एक निश्चित रूप से अहम वर्ग है.
वे कहते हैं, "आँकड़ों के आधार पर देखें तो यूपी में तकरीबन आठ से दस फीसदी वोट ब्राह्मणों का है. और किसी भी राज्य में किसी जाति का इतनी बड़ी संख्या में मतदाता होना चुनावी गणित के लिहाज़ से अहम होता है."
क्या बीजेपी को कोई फायदा होगा?
लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वर्ग में पार्टी के प्रति असंतोष पनपने की बात कही जा रही है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जितिन प्रसाद आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए ब्राह्मणों का गुस्सा शांत कर पाएंगे.
क्योंकि कुछ समय पहले तक वह स्वयं ब्राह्मणों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के लिए योगी आदित्यनाथ को आड़े हाथों ले रहे थे.
इस सवाल पर संजय कुमार कहते हैं, "आँकड़ों को देखें तो पिछले कई चुनावों में ब्राह्मण वोट बीजेपी के साथ ही रहा है. मेरी राय में जितिन प्रसाद इतने बड़े जनाधार वाले कद्दावर नेता नहीं है जिनके बीजेपी में जाने से बचा-खुचा ब्राह्मण वोट भी बीजेपी में चला जाएगा."
जितिन प्रसाद के चुनावी प्रदर्शन की बात करें तो वह पिछले दोनों चुनाव हार चुके हैं. कांग्रेस ने उन्हें पश्चिम बंगाल में कमान सौंपी थी जहां कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली है.
यूपी की राजनीति में जाति समीकरणों को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस इस समय जिस जगह पर है, वहां उसे जितिन प्रसाद के जाने से किसी तरह का नुकसान होने की संभावना नहीं है.
वे कहते हैं, "राजनीति में कोई व्यक्ति या तो एसेट यानी ताकत या लायबिलिटी यानी बोझ होता है. जितिन प्रसाद के पिछले चुनावी प्रदर्शन पर नज़र डालें तो वह किसी भी स्थिति में कांग्रेस पार्टी की ताकत या सामर्थ्य के रूप में खड़े हुए नज़र नहीं आते हैं."
"अगर बात करें बीजेपी को होने वाले फायदे की तो मैं ये कहूंगा कि इससे बीजेपी को भी किसी तरह का फायदा होता नहीं दिख रहा है. क्योंकि, उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस कहीं लड़ाई में नहीं है. इस समय टक्कर में समाजवादी पार्टी है. और अगर बीजेपी सपा में से किसी ब्राह्मण नेता को लेकर आती तो इससे ब्राह्मणों में एक संदेश जाता. लेकिन जितिन प्रसाद को लाकर संदेश भेजने के स्तर पर भी बड़ा काम नहीं किया गया है. जाति के स्तर पर भी बड़ा काम नहीं किया गया है."
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