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मैला ढोने की प्रथा पर जवाब देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह सिर पर मैला ढोने की प्रथा के मुद्दे पर राज्यों को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता तथा वह इससे संबंधित याचिका पर सुनवाई करेगा। प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने मामले को अगस्त के तीसरे सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
सोमवार को संक्षिप्त सुनवाई के दौरान गैर सरकारी संगठन क्रिमिनल जस्टिस सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से अधिवक्ता आशिमा मंडला ने कहा कि हर पांच दिन में सिर पर मैला ढोने वाले एक व्यक्ति की मौत हो जाती है। यह मुद्दा राज्यसभा में भी उठ चुका है।
मंडला ने कहा कि फरवरी 2019 में मामले में नोटिस जारी किया गया था और 40 से अधिक प्रतिवादियों में से केवल 13 ने ही जवाबी हलफनामा दाखिल किया है। इस पर पीठ ने कहा, हम लोगों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। हम आगे बढ़ेंगे और उनके खिलाफ प्रतिकूल नतीजे पर विचार करेंगे।
शीर्ष अदालत ने आठ फरवरी, 2019 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से 1993 के बाद से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काम पर रखे गए सिर पर मैला ढोने वाले लोगों की संख्या के बारे में स्थिति रिपोर्ट दायर करने को कहा था। सिर पर मैला ढोने की प्रथा को वर्ष 1993 में अवैध घोषित किया गया था।
न्यायालय ने कहा था कि मामला गंभीर है और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना चाहिए। याचिका में सिर पर मैला ढोने वाले उन लोगों की संख्या बताए जाने का भी आग्रह किया गया है, जिनकी 1993 से बाद के वर्षो में मौत हुई है।
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