होम लॉकडाउन का विश्लेषण: क्यों सब छोड़ छाड़ कर शहर से गांव की ओर भागे लाखों मज़दूर?

समाचारदेश Alert Star Digital Team Apr 3, 2020 03:06 PM

लॉकडाउन का विश्लेषण: क्यों सब छोड़ छाड़ कर शहर से गांव की ओर भागे लाखों मज़दूर?

लॉकडाउन का विश्लेषण: क्यों सब छोड़ छाड़ कर शहर से गांव की ओर भागे लाखों मज़दूर?

लॉकडाउन का विश्लेषण: क्यों सब छोड़ छाड़ कर शहर से गांव की ओर भागे लाखों मज़दूर?

कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने के मद्देनज़र हुए सामाजिक बंदी के बाद बड़े शहरों से मज़दूर बड़ी संख्या में अपने गांव-क़स्बों में वापस आ रहे हैं. चूंकि कोरोनावायरस का फैलाव और संक्रमण ज़्यादा भीड़ के एकत्रित होने पर कई गुना ज़्यादा हो सकता है, इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों का प्रयास था कि किसी भी तरह के पलायन को तात्कालिक रूप से रोक दिया जाए. इसी कारण से सड़क, रेल, और हवाई यातायात को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है.

सार्वजनिक स्वास्थय को लेकर यह अहम फैसला है और इसका कोई विकल्प नहीं था, मगर भारत के वर्तमान सामाजिक-आर्थिक संरचना में सामाजिक बंदी का कदम आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए कई तरह के मुश्किलों को पैदा करने वाला है, जिसका दुष्परिणाम आने वाले महीनों में ज़्यादा व्यापक और स्पष्ट हो जाएगा.

भारत में काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर प्रति दिन औसतन 500 रुपए की कमाई कर लेते हैं. फ़र्ज़ कीजिए कि उनकी महीने के तीसों दिन कमाई हो रही है तब भी एक मज़दूर महीने में 15,000 रुपए से ज़्यादा कमाई नहीं कर पाता है. किसी भी शहर में रहने-खाने के खर्च में अगर कम कम से 4000 रुपए और अन्य अनियोजित ख़र्च के लिए 1000 रुपए अगर वेतन से घटा दिया जाए तो उसके बाद बमुश्किल 8-10 हज़ार रूपए बचते हैं, जिसके सहारे गांव-क़स्बे में रहने वाला उसका परिवार जीवन यापन करता है.

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