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प्रादेशिकीउत्तर-प्रदेशविचारकानून Alert Star Digital Team Sep 13, 2025 07:24 PM

प्रेम संबंध में सहमति से बने शारीरिक संबंध दुष्कर्म नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि लंबे समय तक प्रेम संबंध में रहते हुए दोनों पक्षों की सहमति से शारीरिक संबंध बनाए गए हों, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

प्रेम संबंध में सहमति से बने शारीरिक संबंध दुष्कर्म नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि लंबे समय तक प्रेम संबंध में रहते हुए दोनों पक्षों की सहमति से शारीरिक संबंध बनाए गए हों, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह टिप्पणी महोबा जिले की एक महिला द्वारा अपने सहकर्मी लेखपाल के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए की।

शादी का वादा और आरोप

पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने जन्मदिन की पार्टी के बहाने उसे नशीला पदार्थ खिलाकर शारीरिक संबंध बनाए और उसका वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया। महिला का कहना था कि आरोपी ने शादी का वादा किया, लेकिन चार साल बाद जातिगत कारणों का हवाला देते हुए शादी से इंकार कर दिया। पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई नहीं की, जिसके बाद पीड़िता ने एससी/एसटी विशेष अदालत में परिवाद दाखिल किया। हालांकि, वहां भी याचिका खारिज होने पर उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

आरोपी की ओर से पेश दलीलें

आरोपी लेखपाल के वकील ने अदालत में कहा कि पीड़िता ने पहले ही पुलिस से लिखकर कार्रवाई करने से मना कर दिया था। वकील ने यह भी दावा किया कि आरोपी ने पीड़िता को दिए गए दो लाख रुपये वापस मांगे थे, जिसके बाद बदले की भावना से यह मामला दर्ज किया गया। उनका कहना था कि महिला के आरोप निराधार हैं और केवल आर्थिक विवाद के चलते लगाए गए हैं।

कोर्ट की टिप्पणी और फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है कि दोनों पक्ष लंबे समय तक प्रेम संबंध में थे और शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने थे। अदालत ने टिप्पणी की कि अगर महिला यह जानती है कि सामाजिक या अन्य कारणों से शादी संभव नहीं है, फिर भी वर्षों तक स्वेच्छा से संबंध बनाए रखती है, तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।

यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि केवल शादी का वादा करके बने रिश्ते को हमेशा दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से चले हों। हाईकोर्ट का यह आदेश भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

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