होम Trump-Iran Deal की सबसे बड़ी शर्त! आखिर अमेरिका ईरान को Nuclear Power बनने से क्यों रोकना चाहता है?
अमेरिका और ईरान के बीच 18 जून 2026 को हुए 14-सूत्रीय समझौते में सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह रही कि ईरान भविष्य में न तो परमाणु हथियार खरीदेगा, न उनका विकास करेगा और न ही उनका निर्माण करेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच 18 जून 2026 को हुए 14-सूत्रीय समझौते में सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह रही कि ईरान भविष्य में न तो परमाणु हथियार खरीदेगा, न उनका विकास करेगा और न ही उनका निर्माण करेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रावधान को पूरे समझौते की "99.9%" सफलता बताया। इसके बाद दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा कि आखिर अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इतना चिंतित क्यों है और क्या परमाणु शक्ति बनने के बाद ईरान अमेरिका के लिए सीधी चुनौती बन सकता है?
अमेरिका लंबे समय से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की नीति पर काम करता रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी कारण बताए जाते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि ईरान को परमाणु बम विकसित करने से रोकना अमेरिकी कार्रवाई का प्रमुख उद्देश्य रहा है। उनका दावा है कि यह नया समझौता ऐसी सुरक्षा दीवार तैयार करता है, जिससे ईरान भविष्य में परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा।
ट्रंप पहले भी 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की आलोचना करते रहे हैं। उनका मानना था कि वह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं था। इसी वजह से उन्होंने 2018 में अमेरिका को उस समझौते से बाहर कर लिया था। अब उनका प्रयास एक ऐसे नए समझौते को स्थापित करना है, जिसे वे अधिक प्रभावी और स्थायी मानते हैं।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध से पहले ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का बड़ा भंडार मौजूद था। विशेषज्ञों का मानना है कि 60 प्रतिशत से हथियार-ग्रेड 90 प्रतिशत संवर्धन तक पहुंचने की दूरी अपेक्षाकृत कम होती है। यही कारण है कि अमेरिका इस यूरेनियम को नष्ट करने, देश से बाहर भेजने या पतला करने की मांग करता रहा है।
अमेरिका का आरोप रहा है कि ईरान क्षेत्र में कई सशस्त्र समूहों का समर्थन करता है। अमेरिकी रणनीतिक सोच के अनुसार, यदि ईरान के पास परमाणु क्षमता आ जाती है तो ऐसे समूहों को भी अप्रत्यक्ष रूप से अधिक सुरक्षा और प्रभाव मिल सकता है।
अमेरिका खुद को वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का प्रमुख खिलाड़ी मानता है। ऐसे में यदि उसके दबाव और सैन्य अभियानों के बावजूद ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेता है, तो इसे अमेरिकी प्रभाव और शक्ति के लिए बड़ा झटका माना जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में ऐसा होना बेहद मुश्किल है। सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता के मामले में अमेरिका और ईरान के बीच बहुत बड़ा अंतर मौजूद है।
अमेरिका के पास हजारों परमाणु हथियार, विशाल सैन्य बजट, वैश्विक सैन्य ठिकाने, आधुनिक तकनीक और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। दूसरी ओर, ईरान क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावशाली जरूर है, लेकिन उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता अमेरिका की तुलना में काफी सीमित मानी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि परमाणु क्षमता हासिल करने की स्थिति में ईरान मध्य पूर्व में अपनी क्षेत्रीय स्थिति को और मजबूत कर सकता है।
अमेरिका की चिंता केवल परमाणु हथियार तक सीमित नहीं है, बल्कि उन संभावित परिणामों को लेकर भी है जो इससे पैदा हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान परमाणु शक्ति बनता है तो सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र जैसे देश भी अपने परमाणु कार्यक्रमों को तेज कर सकते हैं। इससे पूरे क्षेत्र में हथियारों की नई दौड़ शुरू होने का खतरा पैदा हो सकता है।
अमेरिका का एक बड़ा रणनीतिक सहयोगी इजरायल है। इसी कारण ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमता को अमेरिका इजरायल की सुरक्षा से भी जोड़कर देखता है।
दुनिया के ऊर्जा व्यापार में होर्मुज स्ट्रेट की महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान की सामरिक क्षमता बढ़ती है तो इस समुद्री मार्ग पर उसका प्रभाव भी बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि यदि ईरान भविष्य में ऊर्जा व्यापार के लिए वैकल्पिक मुद्राओं को बढ़ावा देता है, तो इससे डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिका की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से इस आशंका को लेकर सतर्क रही हैं कि संवेदनशील सैन्य तकनीक गलत हाथों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। यही चिंता परमाणु तकनीक के संदर्भ में भी जताई जाती है।
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी शर्तों को किस तरह लागू किया जाता है। कई जानकारों का कहना है कि ईरान के मौजूदा संवर्धित यूरेनियम भंडार के निपटान, निरीक्षण प्रक्रिया और भविष्य की निगरानी व्यवस्था जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए.के. पाशा के अनुसार, समझौते में यूरेनियम के निपटान की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर कई बिंदु स्पष्ट होने बाकी हैं। साथ ही, ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को लेकर पहले से अपना रुख स्पष्ट करता रहा है।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता अंतिम समाधान नहीं बल्कि एक अवसर है। आने वाले महीनों में दोनों देशों की प्रतिबद्धता और समझौते के क्रियान्वयन से ही तय होगा कि यह व्यवस्था स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ती है या नहीं।
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