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उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति एक Flop Show
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने है। राजनीतिक सरगर्मियां वहां बढ़ी हुई हैं। मुख्य मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच माना जा रहा है। दोनों ही पार्टियों ने राज्य की छोटी-छोटी राजनीतिक दलों से गठबंधन किया है। राजनीतिक दल अब भी अपने सियासी समीकरणों को साधने के लिए अपने गठबंधन को मजबूत कर रहे हैं। भाजपा से मुकाबला करने के लिए अखिलेश यादव ने छोटे-छोटे दलों से गठबंधन किया है जबकि भाजपा भी अपना दल और निषाद पार्टी जैसे राजनीतिक दलों से गठबंधन कर आगे बढ़ रही है। समाजवादी पार्टी के साथ पश्चिम में जयंत चौधरी खड़े हैं तो वहीं पूरब में ओमप्रकाश राजभर हैं। हालांकि 2019 में गठबंधन का कड़वा घूंट पी चुकी मायावती इस बार पहले ही गठबंधन की संभावनाओं को खारिज कर चुकी हैं। कांग्रेस की स्थिति उत्तर प्रदेश में ऐसी है जहां कोई दल उसके साथ फिलहाल जाना नहीं चाहता है। कुल मिलाकर देखें तो उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प रहा है। लेकिन अगर यह भी कहें कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन कभी भी सफल नहीं रहा है तो उसमें भी कोई दो राय नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश की राजनीतिक इतिहास को देखें तो पिछले 5 दशक में यहां कई गठबंधन हुए और टूटे भी। कुछ गठबंधन चुनाव से पहले हुए तो कुछ गठबंधन को सत्ता में बने रहने के लिए चुनाव के बाद किया गया। हालांकि यह बात भी सच है कि उत्तर प्रदेश में अब तक कोई भी सियासी गठबंधन टिकाऊ साबित नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश में गठबंधन का सबसे पहला प्रयोग 1967 में हुआ था। अलग-अलग सियासी दलों का साथ लेकर चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने का मौका मिला था। उस सरकार में भारतीय लोक दल, कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ शामिल हुई थी। लेकिन यह सरकार 1 साल भी नहीं चल सकी। बाद में 1970 कांग्रेस से अलग हुए कुछ विधायकों ने त्रिभुवन सिंह के नेतृत्व में साझा सरकार बनाया जिसे जनसंघ का भी समर्थन हासिल हुआ परंतु यह भी गठबंधन असफल साबित हुआ।
उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति का प्रयोग एक बार फिर से 1977 में हुआ जब कांग्रेस के खिलाफ देश में नाराजगी थी। जनसंघ का साथ लेकर जनता पार्टी ने राम नरेश यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई परंतु यह भी टिकाऊ साबित नहीं हो पाई। अलग-अलग विचारधाराओं को मिलकर बनी यह गठबंधन कुछ ही दिनों में बिखर गई। एक समय ऐसा आया जब देश में कांग्रेस विरोधी पार्टियों ने एक नया मोर्चा बनाया और इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश में भी जनता दल की सरकार बनी जिसका नेतृत्व मुलायम सिंह कर रहे थे। इस गठबंधन में भाजपा भी शामिल थी जिसने राम मंदिर आंदोलन की वजह से मुलायम सिंह से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद मुलायम सिंह ने कांग्रेस के साथ मिलकर अपनी सरकार जरूर बचाई लेकिन यह सरकार 5 साल नहीं चल सकी।
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