होम यूपी में ब्राह्मण विधायकों की नाराजगी की असली वजह आई सामने, आबादी ज्यादा फिर भी ठाकुरों से पिछड़े, ये आंकड़े खोल रहे पोल
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों जातिगत समीकरणों को लेकर भारी उथल-पुथल मची हुई है। हाल ही में ठाकुर कुटुंब की तर्ज पर हुई ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने भारतीय जनता पार्टी की चिंता बढ़ा दी है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों जातिगत समीकरणों को लेकर भारी उथल-पुथल मची हुई है। हाल ही में 'ठाकुर कुटुंब' की तर्ज पर हुई ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने भारतीय जनता पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में इस बैठक को सामान्य नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे पार्टी के भीतर जातीय संतुलन बिगड़ने और असंतोष के स्वर के रूप में देखा जा रहा है। सियासी जानकार इसे सीधे तौर पर 'ठाकुर बनाम ब्राह्मण' की वर्चस्व की लड़ाई और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाने की रणनीति मान रहे हैं।
ब्राह्मण विधायकों की इस नाराजगी को महज एक अफवाह मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 10-11 फीसदी मानी जाती है, जबकि ठाकुरों की हिस्सेदारी लगभग 6-7 फीसदी है। लेकिन जब सत्ता में प्रतिनिधित्व की बात आती है, तो कम आबादी वाले ठाकुर समुदाय का पलड़ा भारी नजर आता है।
यूपी विधानसभा और विधान परिषद में भाजपा के प्रतिनिधित्व के आंकड़े इस असंतोष की असली वजह स्पष्ट करते हैं:
इसके अलावा ओबीसी के 84, अनुसूचित जाति के 59 और अन्य सवर्ण जातियों के 28 विधायक हैं। साफ है कि संख्याबल में ज्यादा होने के बाद भी सदन के दोनों हिस्सों में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व राजपूतों के मुकाबले कम है।
सूत्रों का कहना है कि विधायकों की बैठक में समाज की भूमिका और घटते प्रतिनिधित्व पर गंभीर चर्चा हुई है। यह स्थिति भाजपा के लिए चिंताजनक है क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर दोनों ही पार्टी के कोर वोट बैंक माने जाते हैं। उधर, समाजवादी पार्टी भी इस मौके को भुनाने में लगी है और सरकार पर मुख्यमंत्री की जाति (ठाकुर) के लोगों को विशेष संरक्षण देने का आरोप लगाती रही है। मानसून सत्र के दौरान ठाकुर विधायकों की बैठक को जहां सीएम के प्रति एकजुटता माना गया था, वहीं ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने पार्टी के भीतर जातीय संतुलन साधने की चुनौती खड़ी कर दी है।
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