होम US-Iran Tension: टूटा सीजफायर, अब Hormuz Strait पर टिकी दुनिया की नजर, जानिए क्यों भारत के लिए अगले 40 दिन होंगे बेहद अहम
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जून में हुए संघर्षविराम (Ceasefire) को समाप्त घोषित किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जून में हुए संघर्षविराम (Ceasefire) को समाप्त घोषित किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस घटनाक्रम के बाद वैश्विक तेल बाजार और होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) पर पूरी दुनिया की नजरें टिक गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले करीब 40 दिन भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम लोगों की जेब के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ संघर्षविराम अब समाप्त हो चुका है। इसके बाद अमेरिका ने ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की, जबकि ईरान ने भी बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।
इस बढ़ते तनाव का असर अब केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार पर इसका प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
संघर्षविराम के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 69-70 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई थी। हालांकि, तनाव बढ़ने के बाद यह फिर 78 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। यानी कुछ ही दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 7 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है।
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाला बदलाव सीधे भारत की ऊर्जा लागत को प्रभावित करता है।
फिलहाल देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर पर बिक रहा है। हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रेंट क्रूड 75 से 78 डॉलर प्रति बैरल के बीच बना रहता है तो अगले दो से चार सप्ताह में तेल कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है। यदि कीमतें 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं तो ईंधन महंगा होने की संभावना और बढ़ सकती है।
दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इस समुद्री मार्ग पर किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है। अब देश अपनी लगभग 70 प्रतिशत तेल जरूरतें होर्मुज के बाहर के स्रोतों से पूरी करता है, जबकि पहले यह आंकड़ा करीब 55 प्रतिशत था।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) की आपूर्ति अब भी काफी हद तक खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है। यदि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो रसोई गैस, सीएनजी (CNG) और पीएनजी (PNG) की लागत बढ़ सकती है। साथ ही समुद्री बीमा और शिपिंग खर्च बढ़ने से अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। तेल आयात के लिए भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है।
बुधवार को रुपया करीब 60 पैसे कमजोर होकर 95.56 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो लगभग एक महीने का सबसे निचला स्तर बताया जा रहा है।
कमजोर रुपया इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल, मशीनरी और अन्य आयातित उत्पादों को महंगा बना सकता है। अगस्त और सितंबर में त्योहारी सीजन शुरू होता है। यदि तब तक तेल महंगा और रुपया कमजोर बना रहता है तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला है। सेंसेक्स में 1,677 अंकों की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निवेशकों की करीब 9 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घट गई। वहीं इंडिया VIX में लगभग 30 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगले 40 दिनों में बाजार मुख्य रूप से तीन बातों पर नजर रखेगा—
यदि इन मोर्चों पर राहत नहीं मिलती तो बाजार में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है।
भारत ने तेल आयात के वैकल्पिक स्रोत बढ़ाकर अपनी स्थिति पहले की तुलना में मजबूत जरूर की है, लेकिन वह पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं है।
यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है, होर्मुज स्ट्रेट खुला रहता है और कच्चे तेल की कीमतें फिर 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती हैं तो भारत को राहत मिल सकती है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तेल आपूर्ति प्रभावित होती है और ब्रेंट क्रूड 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंच जाता है, तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा।
ऐसी स्थिति में रसोई गैस, CNG, PNG, महंगाई, रुपये की मजबूती और शेयर बाजार सभी पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में पश्चिम एशिया का यह भू-राजनीतिक तनाव आने वाले हफ्तों में भारत की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के खर्च पर अहम असर डाल सकता है।
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