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समाचारदेशविचारकानून Alert Star Digital Team Mar 24, 2026 08:49 PM

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, महिला सैन्य अधिकारियों को मिला न्याय, स्थाई कमीशन पर भेदभाव को लेकर सरकार से तीखे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च 2026) को एक अहम फैसले में कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला सैन्य अधिकारी स्थाई कमीशन की हकदार हैं और उन्हें सिस्टम में असमानता का सामना करना पड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, महिला सैन्य अधिकारियों को मिला न्याय, स्थाई कमीशन पर भेदभाव को लेकर सरकार से तीखे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च 2026) को एक अहम फैसले में कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला सैन्य अधिकारी स्थाई कमीशन की हकदार हैं और उन्हें सिस्टम में असमानता का सामना करना पड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मनमाने मूल्यांकन के कारण स्थाई कमीशन से वंचित की गई महिला अधिकारियों को पूर्ण पेंशन लाभ दिया जाएगा।

यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया गया, जिन्हें विंग कमांडर सुचेता एडन और अन्य अधिकारियों ने दायर किया था। याचिकाओं में 2019 की नीतिगत बदलावों और सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के फैसलों के आधार पर स्थाई कमीशन न दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

20 साल की सेवा मानकर मिलेगा पेंशन लाभ

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने आदेश दिया कि जिन महिला अधिकारियों के नाम पर 2019, 2020 और 2021 में चयन बोर्डों ने विचार किया था, उनकी सेवा अवधि 20 वर्ष मानी जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन के लिए जरूरी न्यूनतम सेवा अवधि पूरी मानी जाएगी, भले ही अधिकारियों को उससे पहले सेवा से मुक्त कर दिया गया हो। यह आदेश एक विशेष उपाय के रूप में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष अधिकार प्रदान करता है।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन की गणना 20 वर्ष की सेवा के आधार पर की जाएगी और यह व्यवस्था 1 नवंबर 2025 से प्रभावी मानी जाएगी।

ACR मूल्यांकन प्रक्रिया पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणी

फैसले के दौरान कोर्ट ने महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) प्रणाली पर भी सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, 'एसीआर इस धारणा के साथ लिखी गई कि उनके करियर में कोई प्रगति नहीं होगी. इससे उनकी समग्र योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.'

बेंच ने पाया कि मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और पूर्वाग्रहपूर्ण धारणा के कारण कई महिला अधिकारियों को नुकसान उठाना पड़ा।

वायुसेना, थलसेना और नौसेना मामलों की अलग-अलग समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने वायुसेना, थलसेना और नौसेना से जुड़े मामलों की अलग-अलग समीक्षा की। वायुसेना के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि 2019 में लागू किए गए सेवा अवधि और न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड जल्दबाजी में लागू किए गए, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित अवसर नहीं मिला।

थलसेना और नौसेना से जुड़े मामलों में भी कोर्ट ने मूल्यांकन मॉडल में समान खामियां पाईं और कहा कि मूल्यांकन मानदंडों का खुलासा न करना अधिकारियों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

बहाली नहीं, लेकिन वित्तीय लाभ सुनिश्चित

सुप्रीम कोर्ट ने कार्यात्मक प्रभावशीलता का हवाला देते हुए अधिकारियों की सेवा में बहाली का आदेश देने से इनकार किया। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कारण उन्हें वित्तीय लाभों से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता।

कोर्ट ने सक्रिय सेवा में न रहने वाले अधिकारियों को विंग कमांडर रैंक पर पदोन्नति देने की मांग भी खारिज कर दी।

केंद्र सरकार ने नीति का किया बचाव

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि सेना की प्रक्रियाएं लिंग-तटस्थ हैं और अधिकारियों को सेवा से मुक्त करना बल को युवा बनाए रखने की नीति का हिस्सा है।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिला अधिकारियों के साथ हुए भेदभाव और मूल्यांकन प्रक्रिया की खामियों को गंभीर माना।

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