होम कर्तव्य पथ पर गूंजा वंदे मातरम, गुजरात की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए विदेशी मेहमान, 150 साल पुरानी कहानी हुई जीवंत

समाचारदेश Alert Star Digital Team Jan 26, 2026 07:02 PM

कर्तव्य पथ पर गूंजा वंदे मातरम, गुजरात की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए विदेशी मेहमान, 150 साल पुरानी कहानी हुई जीवंत

देश के 77वें गणतंत्र दिवस के भव्य समारोह में कर्तव्य पथ पर भारत की सांस्कृतिक विरासत और वीरता की अद्भुत झलक देखने को मिली.

कर्तव्य पथ पर गूंजा वंदे मातरम, गुजरात की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए विदेशी मेहमान, 150 साल पुरानी कहानी हुई जीवंत

नई दिल्ली: देश के 77वें गणतंत्र दिवस के भव्य समारोह में कर्तव्य पथ पर भारत की सांस्कृतिक विरासत और वीरता की अद्भुत झलक देखने को मिली. इस दौरान गुजरात की झांकी ने 'वंदे मातरम' के उद्घोष के साथ दर्शकों का मन मोह लिया. 'वंदे मातरम' गीत की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर तैयार की गई इस झांकी में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा और आजादी के दीवानों के संघर्ष को बेहद खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया. गुजरात की इस प्रस्तुति ने स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वतंत्रता के मंत्र को एक बार फिर जीवंत कर दिया.

मैडम भीकाजी कामा और तिरंगे का गौरवशाली इतिहास

झांकी का सबसे प्रमुख आकर्षण इसका अग्रभाग था, जहां गुजरात के नवसारी में जन्मीं महान वीरांगना मैडम भीकाजी कामा की आदमकद प्रतिमा नजर आई. इसमें उन्हें विदेशी धरती पर भारतीय ध्वज फहराते हुए दिखाया गया, जिसे उन्होंने खुद डिजाइन किया था और जिस पर 'वंदे मातरम' अंकित था. ज्ञात हो कि मैडम कामा ने 1907 में पेरिस और जर्मनी में यह ध्वज फहराकर क्रांति की अलख जगाई थी. उनकी प्रतिमा के नीचे संविधान में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में 'वंदे मातरम' लिखा हुआ था, जो भारत की विविधता में एकता को दर्शाता है.

कोलकाता से लेकर संविधान सभा तक का सफर

झांकी के मध्य भाग में तिरंगे के क्रमिक विकास और इतिहास की रोचक कहानी बयां की गई. इसमें दिखाया गया कि कैसे 1906 में कोलकाता में पहली बार 'वंदे मातरम' लिखा ध्वज फहराया गया था. इसके बाद 1917 में एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक का ध्वज, और फिर 1921 में पिंगली वेंकैया द्वारा गांधी जी को सौंपा गया नया डिजाइन प्रदर्शित किया गया. झांकी में यह भी दर्शाया गया कि कैसे 1931 में चरखे वाले झंडे को स्वीकृति मिली और अंततः 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने अशोक चक्र वाले वर्तमान तिरंगे को अपनाया.

गांधी जी का चरखा और 'आत्मनिर्भर भारत' का संदेश

झांकी के अंतिम हिस्से में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनके प्रिय 'चरखे' को एक विशाल धर्म चक्र के साथ प्रदर्शित किया गया. यह हिस्सा स्वदेशी और स्वावलंबन के उस विचार को समर्पित था, जो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की नींव है. इस दौरान 'राष्ट्रीय शायर' झवेरचंद मेघाणी के प्रसिद्ध गीत ‘कसुंबी नो रंग’ की धुन पर कलाकारों ने पूरे माहौल को जोश से भर दिया.

पहली बार परेड में शामिल हुए 'साइलेंट वॉरियर्स'

इस बार की परेड में कई चीजें पहली बार देखने को मिलीं. यूरोपीय संघ (EU) के शीर्ष नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे. परेड में पहली बार 'साइलेंट वॉरियर्स' यानी बेक्ट्रियन ऊंट, सियाचिन के खच्चर और सैन्य कुत्तों के दस्ते ने हिस्सा लिया. इसके अलावा, गुजरात की बेटी और सीआरपीएफ की सहायक कमांडेंट सिमरन बाला ने पहली बार सीआरपीएफ की पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व कर महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की.

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