होम विकास या पर्यावरण पर खतरा, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर उठे 11 बड़े सवालों के जवाब
भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार परियोजना इस समय विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर चर्चा में है. एक तरफ इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक ताकत को बढ़ाने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है,
भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार परियोजना इस समय विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर चर्चा में है. एक तरफ इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक ताकत को बढ़ाने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके पर्यावरणीय प्रभाव, जैव विविधता और स्थानीय जनजातीय समुदायों पर असर को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. इन सभी पहलुओं को समझने के लिए परियोजना से जुड़े अहम बिंदुओं पर नजर डालना जरूरी है.
यह परियोजना भारत की एक बड़ी रणनीतिक और आर्थिक पहल है, जिसका मकसद हिंद महासागर क्षेत्र में देश की मौजूदगी को मजबूत करना है. इसके तहत अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, पावर प्लांट और आधुनिक टाउनशिप विकसित करने की योजना है.
इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में आत्मनिर्भर बनाना है. अभी देश को कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे लागत और समय बढ़ता है. यह परियोजना उस निर्भरता को कम करने और भारत को लॉजिस्टिक्स हब बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.
सरकार का कहना है कि परियोजना के लिए कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82% हिस्सा ही उपयोग में लिया जाएगा और बाकी क्षेत्र संरक्षित रहेगा. साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए निगरानी और संरक्षण के उपाय लागू किए जाएंगे.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि द्वीप की संवेदनशील पारिस्थितिकी को देखते हुए जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
इस परियोजना के तहत करीब 7.11 लाख पेड़ काटे जाने का अनुमान है, जिससे पर्यावरण को नुकसान की चिंता बढ़ी है. सरकार का दावा है कि इसकी भरपाई ‘कम्पेंसेटरी अफॉरेस्टेशन’ के जरिए की जाएगी. इसके तहत हरियाणा में लगभग 97.30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नए जंगल विकसित करने की योजना है.
फिर भी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या अलग भौगोलिक क्षेत्र में किया गया वनीकरण द्वीप की जैव विविधता की वास्तविक भरपाई कर पाएगा.
परियोजना को Environmental Impact Assessment (EIA) 2006 के तहत मंजूरी दी गई है. इसके साथ 42 सख्त शर्तें लागू की गई हैं, जिनमें पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और कोस्टल रेगुलेशन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं. सरकार का कहना है कि इन नियमों के जरिए नुकसान को न्यूनतम रखने की कोशिश की जाएगी.
स्थानीय शोंपेन और निकोबारी जनजातियों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी समुदाय का विस्थापन नहीं होगा और उनकी जीवनशैली व अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी.
इसके अलावा, जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में लगभग 3.9 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि का भी दावा किया गया है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ क्षेत्र बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और संरक्षण भी जरूरी है.
परियोजना के तहत 14.2 मिलियन TEU क्षमता वाला ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, 450 MVA का गैस-सोलर पावर प्लांट और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जाएगी. इन सभी सुविधाओं का लक्ष्य ग्रेट निकोबार को एक प्रमुख व्यापारिक और लॉजिस्टिक्स हब बनाना है.
ग्रेट निकोबार भूकंप और चक्रवात जैसे खतरों के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है. इसे ध्यान में रखते हुए विस्तृत डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया है. सरकार के अनुसार, सभी निर्माण कार्य आपदा-रोधी डिजाइन के तहत किए जाएंगे ताकि जोखिम को कम किया जा सके.
सरकार इस परियोजना को आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संतुलन का उदाहरण बता रही है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन दावों को जमीन पर कितनी पारदर्शिता और प्रभावशीलता के साथ लागू किया जाता है.
ग्रेट निकोबार का स्थान मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है. यहां विकसित होने वाला पोर्ट और एयरपोर्ट भारतीय सशस्त्र बलों को बेहतर निगरानी, तेज तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट देगा. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी.
सरकार इस परियोजना को विकास, सुरक्षा और पर्यावरण के संतुलन के रूप में पेश कर रही है. यह भारत की समुद्री, आर्थिक और रक्षा ताकत को बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन सभी दावों को जमीनी स्तर पर ईमानदारी और प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकेगा. आने वाले समय में यही तय करेगा कि यह परियोजना एक सफल मॉडल बनती है या विवादों में घिरी रहती है.
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