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पुद्दुचेरी से किरण बेदी की विदाई का सबब क्या है?
राष्ट्रपति ने केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी को हटा दिया है. दरअसल बेदी को वापस बुलाने के फ़ैसले के कई मायने हैं. यह बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का डैमेज कंट्रोल मैकेनिज्म हो सकता है क्योंकि पुद्दुचेरी में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं.
लेकिन बेदी को हटाने की एक और वजह हो सकती है. दरअसल तमिलनाडु में भी चुनाव होने हैं और बीजेपी नहीं चाहती थी कि किरण बेदी के कामकाज के तरीका वहां कोई मुद्दा बन जाए.
पुद्दुचेरी में किरण बेदी और मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी के बीच आम जनता के समर्थन में चलाई जा रही कई नीतियों को लागू करने के सवाल पर शुरू से टकराव रहा है.
पोंगल और दिवाली में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को मुफ्त चावल बांटने का मामला हो या कॉन्ट्रैक्ट टीचरों की नियुक्ति का सवाल, दोनों एक दूसरे के काम करने के तरीकों का विरोध करते रहे हैं.
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के प्रोफ़ेसर लक्ष्मणन ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इस बात में कोई शक नहीं कि बेदी के कामकाज का तरीका बीजेपी के लिए शर्मिंदगी की वजह बनता जा रहा था. लिहाजा पार्टी के लिए उन्हें हटाने का फ़ैसला उसका अपना नुकसान कम करने के लिए उठाया गया क़दम ही है. अगर उन्हें बरक़रार रखा जाता तो इसका असर तमिलनाडु पर भी पड़ता.
एलजी और सीएम के बीच गहरे मतभेद
प्रोफेसर लक्ष्मणन ने कहा, "बेदी रोजमर्रा के काम में दख़ल देती थीं. यह बेवजह था. सरकार के कामकाज में बेदी का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया था कि वह सरकार के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को भी पूरा करने की राह में अड़चन डालने लगी थीं. "
प्रोफ़ेसर लक्ष्मणन कहते हैं, "कहावत है कि जब दो हाथी लड़ते हैं तो नीचे की घास कुचली जाती है. बेदी और नारायस्वामी की लड़ाई में इस कहावत को लागू करते हुए कहा जा सकता है कि जब प्रशासन पर मार पड़ती है तो आम जनता को झेलना पड़ता है".
बेदी और नारायणस्वामी के बीच टकराव तो साल 2016 से शुरू हो गए थे. दोनों को झगड़ा इतना बढ़ गया था कि फरवरी 2019 में सीएम को राजभवन (लेफ्टिनेंट गवर्नर का आवास) के सामने छह दिनों तक धरना देना पड़ा.
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