होम अतीत को पुनर्जीवित करते हैं जीवाश्म विज्ञानी
जूरासिक पार्क की कहानी केवल कल्पना ही नहीं बल्कि सच्चाई के काफी निकट है:- क्या आपने अमेरिका में निर्मित सुप्रसिद्घ फिल्म जूरासिक पार्क देखी है, जिसने सारे विश्व में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे?
जूरासिक पार्क की कहानी केवल कल्पना ही नहीं बल्कि सच्चाई के काफी निकट है:- क्या आपने अमेरिका में निर्मित सुप्रसिद्घ फिल्म जूरासिक पार्क देखी है, जिसने सारे विश्व में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे? यदि प्रश्न का उत्तर हां हैं, तो आप को ज्ञात होगा कि इस फिल्म की कहानी के पात्र विशालकाय डायनासौर थे जो आज के नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों पुराने निवासी थे। प्रत्यक्ष है कि इन जीवों को किसी ने देखा नहीं है और न ही उनके चित्र अथवा और कोई पहचान उपलब्ध है। इसके बावजूद इन जीवों के रंग, रूप तथा आकार की कल्पना करके उन्हें लगभग जीवित स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। और इस प्रकार आज विश्व का बच्चा-बच्चा इन अनदेखे तथा अनजाने जीवों के आकार, प्रकार तथा जीवन शैली से परिचित है। अचरज तो यह होता है कि लाखों-करोड़ों वर्ष पहले विलुप्त हो चुके डायनासौर तथा इस प्रकार के अन्य प्राणियों के आकार, स्वरूप तथा जीवन की कल्पना कैसे की गई? वास्तव में करोड़ों वर्ष पूर्व मृत हुए इन जीवों की उपस्थिति के सूत्र इस धरती की सतह पर, सागर के गर्भ में तथा अन्य कई स्थानों पर उपलब्ध हैं। ये सूत्र पर्वतों की शिलाओं पर, सागर की तलहटी में, धरती की सतह पर तथा अन्य कई स्थानों पर इन प्राणियों के अवशेषों के रूप में है। ये अवशेष जीवाश्म अथवा फॉसिल कहलाते हैं। इन मृत अवशेषों को जीवित करने का सम्पूर्ण श्रेय जीवाश्म विज्ञानियों को जाता है। ये जीवाश्म विज्ञानी लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व के उन सभी मृत प्राणियों तथा पौधों के अवशेषों का इतिहास, भूगोल तथा कथानक लिखने का प्रयास करते हैं। ये कथाएं कीचड़ में रहने वाले एककोशीय नन्हें जीवों से लेकर टनों भारी विशालकाय डायनसौरों तक तथा छोटे-मोटे पौधों से लेकर भारी भरकम वृक्षों तक की भी हो सकती हैं। अधिकतर अवशेष चट्टानों के रूप पाए जाते हैं। अवशेषों के सूत्र कल्पना कीजिए कि लगभग 40 करोड़ वर्ष पहले सागर के नीले जल में एक छोटी-सी सीप रहती थी। जब इस सीप की मृत्यु हुई तो वह सागर की नर्म तलहटी पर जा गिरी। वहां पर जीवाणुओं ने सीपी के नर्म भागों को खा लिया किन्तु कड़े ढांचे को कोई विशेष क्षति नहीं पहुंची। जैसे-जैसे दूर-दराज की नदियां सागर में जल, मिट्टी तथा रेत गिराती गईं, सीप के ढांचे पर उनकी पर्तें बनती गईं और सीप नीचे दबती गईं। इस प्रकार दबाव बढ़ते रहने से सीप का ढांचा कड़े पत्थर के रूप में परिवर्तित होता गया जिसके अन्दर उसके सम्पूर्ण स्वरूप की नक्काशी-सी हो गई। लाखों वर्षों के बाद पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन हुए तथा सागर का तल ऊपर उठने लगा। युगों बाद, जहां कभी सागर लहराता था, वहां अब भूमि उभर आई थी। इस प्रकार सागर तल में दबी सीप (जो अब तक चट्टान तथा जीवाश्म में परिवर्तित हो चुकी थी) करोड़ों वर्षों बाद जीवाश्म विज्ञानियों के लिए अनोखा उपहार बन चुकी थी, जो उसके आकार तथा बनावट का अध्ययन कर रहे थे और भूमि की सतह के उस भाग में खजाना छिपा हुआ था। वहां करोड़ों वर्ष पुराने घोंघे, शंख, सी-अर्चिन आदि जीवाश्मों के रूप में बिखरे पड़े थे। केवल सागर ही नहीं बल्कि नदियों तथा झीलों की तलहटी आदि में भी ये अवशेष मिल जाते हैं। इसी प्रकार ज्वालामुखी के लावा में भी इस प्रकार के अवशेष मिल जाते हैं जो उन बदनसीब प्राणियों के होते हैं जो ज्वालामुखी से अचानक निकली आग से अपने को बचा नहीं पाए थे। अत्यंत सूक्ष्म जीवों के अवशेष खडि़या मिट्टी के रूप में अथवा खनिज तेल तथा पत्थर के कोयले के रूप में भी मिलते हैं। पत्थर का कोयला दरअसल करोड़ों वर्ष पूर्व के वृक्षों का बदला हुआ रूप है। ये सारे पदार्थ यद्यपि जीवाश्म तो नहीं कहे जा सकते हैं किन्तु इनमें इन जीवों की रासायनिक संरचना दृष्टिगोचर होती है। इन्हीं सब जीवाश्मों, हड्डियों के ढांचों तथा अन्य पदार्थों से जीवाश्म विज्ञानी इन प्राचीनतम रहस्यों का भेद जानने का प्रयास करते हैं। कल्पना को साकार बनाना वैसे इन भेदों को समझना इतना आसान नहीं होता है। यहां एक जासूसी कहानी के गुप्तचर की तरह अनेक गुत्थियों को सुलझाना पड़ता है, जिसमें सूत्र के रूप में कुछ हड्डियों के अवशेष अथवा पत्थर या मिट्टी पर किसी प्राणी के शरीर के अंगों के निशान ही उपलब्ध होते हैं। किन्तु इन्हीं के सहारे जीवाश्म विज्ञानी अपनी कल्पना को साकार करते जाते हैं। ऐसा भी होता है निरंतर शोध से पहले की बनाई हुई धारणाएं बाद में कभी-कभी कोई दूसरा रूप ले लेती हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 1840 से पहले यह समझा जाता था कि डायनासौर किसी विशाल छिपकली जैसे रहे होंगे जो भूमि पर पेट के सहारे अपने चारों पैरों को फैला कर चलते होंगे। बाद में रिचर्ड आवेने नामक जीवाश्म विज्ञानी ने उन हड्डियों पर एक दूसरे प्रकार की शरीराकृति की कल्पना की जिसमें इस प्राणी का शरीर छोटा और पैर बड़े बनाए जो चारों पैरों के सहारे संभला रहता था। और उसके बाद डायनासौर की इसी आकृति को जिसमें वह छिपकली की बजाय चौपाया दिखता था, मान्यता मिल गई। और उसके बाद इस आकार में निरंतर सुधार किया जाता रहा तथा उसमें रोएं, पंख, बाल, कलंगी आदि का समावेश किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज हम भांति-भांति की जातियों और प्रजातियों के डायनासौरों को फिल्म के पर्दे, पत्र-पत्रिकाओं आदि में देखते हैं। जीवाश्म वैज्ञानिकों ने इन हड्डियों, अंडों तथा अन्य अवशेषों के आधार पर यह भी निष्कर्ष निकाले हैं कि कौन-से डायनासौर शाकाहारी थे और कौन-से मांसाहारी, कौन पक्षियों की तरह उड़ान भरता था तो कौन दूसरे डायनासौरों के अंडे चुरा कर खाता था, कौन मन्द बुद्घि वाले थे तो कौन कुशाग्रबुद्घि वाले। अब यह भी हो सकता है कि आने वाले वर्षों में इन मान्यताओं में नई शोधों से कुछ और परिवर्तन हो जाएं। इसके अतिरिक्त, जीवाश्म विज्ञानी इन्हीं अवशेषों के आधार पर इस प्राचीन इतिहास के सन्दर्भ में और भी अनेक नई-नई बातें पता लगाने का प्रयास करते रहते हैं। प्राय: ये बातें उस युग की जलवायु, मौसम, भौगोलिक परिस्थितियों आदि से सम्बंधित होती है। उदाहरण के लिए अलास्का में दबे हुए विशाल कोयले के भण्डार के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि अमेरिका के उत्तरी भाग में जहां आज कल हिमयुग के जैसा वातावरण है, लगभग 8 करोड़ वर्ष पूर्व ग्रीष्म जलवायु तथा पतझड़ वाला युग था। क्योंकि विशाल वृक्ष समूहों पर भूमि के दबाव तथा गर्मी के परिणामस्वरूप ही कोयले की उत्पत्ति होती है। इन्हीं जीवाश्मों द्वारा इस बात की भी पुष्टि हो गई है कि अनेक भूखण्ड करोड़ों वर्ष पूर्व आपस में जुड़े थे और अब वे धीमे-धीमे सरकते हुए एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर जा चुके हैं। जैसे ब्रिटेन के स्काटलैण्ड तथा कनाडा के न्यू फाउन्डलैण्ड में एक ही प्रकार के जीवाश्म पाए गए थे जो एक ही समय के वासी थे। इससे यह निष्कर्ष निकला कि करोड़ों वर्ष पूर्व स्काटलैण्ड तथा न्यू फाउन्डलैण्ड आपस में जुड़े हुए थे। भारत तथा ऑस्ट्रेलिया भी पहले एक ही भूखण्ड के भाग थे जो बाद में अलग-अलग हो गए। इसी प्रकार करोड़ों वर्ष पूर्व ट्राइलोबाइट नामक जंतु पाया जाता था जो सागर के गहरे जल में रहता था। यह जंतु अंधा होता था। इस ट्राइलोबाइट के जीवाश्म इंग्लैण्ड तथा स्कैन्डेनेविया में पाए गए जो लगभग 50 करोड़ वर्ष पुराने थे। इससे यह निष्कर्ष निकला कि लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व ब्रिटेन तथा स्कैन्डेनेविया के बीच गहरा सागर हुआ करता था। विस्तृत खोजों द्वारा इस धारणा की पुष्टि भूगर्भ शास्त्रियों ने भी कर दी थी। इस प्रकार लगभग एक या दो सेंटीमीटर लम्बे ट्राइलोबाइट जीवाश्म ने प्राचीन विश्व का नक्शा ही बदल दिया। वास्तविक आकार के जीवाश्म सबसे उत्तम श्रेणी के जीवाश्म वे होते हैं जिनमें जीवों का स्वरूप तथा रंग-रूप नहीं बदलता है और न ही वे पत्थर के रूप में परिवर्तित होते हैं। ऐसा तब सम्भव होता है जब विलुप्त होने के समय ये जंतु किसी वृक्ष पर बैठे हों तथा अचानक वे वृक्षों से निकलने वाले रेजिन (गोंद) जैसे पदार्थ के अन्दर फंस जाएं। यह गोंद समय के साथ-साथ स्वयं भी जीवाश्म में परिवर्तित हो जाता है जिसे अम्बर कहते हैं। अम्बर एक पारदर्शी पदार्थ होता है तथा इसके अन्दर फंसे कीड़े-मकोड़े, मच्छर, मक्खियां, बिच्छू, टिड्डे या इस प्रकार के अन्य छोटे-मोटे जंतु अथवा नन्हे पौधे, बीज, फल, फूल, बेरियां आदि लगभग पूर्ण रूप से परिरक्षित हो जाते हैं। वास्तव में जूरासिक पार्क फिल्म का कथानक भी इसी अम्बर के अन्दर कैद मच्छरों पर आधारित है। वैसे बहुत कम लोगों को मालूम है कि फिल्म की इस कहानी के पीछे एक वैज्ञानिक तथ्य छुपा हुआ है। कथा के अनुसार करोड़ों वर्ष पूर्व कुछ मच्छरों ने डायनासौरों का खून पीया होगा। ये मच्छर वृक्ष पर बैठने के बाद गोंद में कैद हो गए। गोंद में बंद हो जाने के कारण उनका शरीर जीवाणुओं के आक्रमण से सुरक्षित रहे। समय बीतने के साथ-साथ वह गोंद अम्बर बन गया और उन मृत मच्छरों के लिए एक कब्र का कार्य करने लगा। करोड़ों वर्ष पश्चात एक सनक मिजाज करोड़पति ने प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों की सहायता से उन मृत मच्छरों के शरीर से डायनासौरों का खून निकलवाया जो उन्होंने पीया था। तत्पश्चात उस खून से डी.एन.ए. प्राप्त करके परीक्षणों द्वारा डायनासौर उत्पन्न कराए गए जिनका प्रदर्शन उसने अपने निजी चिडि़याघर में किया। फिल्म की आगे की कहानी इन्हीं डायनासौरों की गतिविधियों तथा उनके द्वारा उत्पन्न आतंक पर आधारित है। अनेक वैज्ञानिकों का विचार है कि भविष्य में अम्बर के अन्दर कैद जीवों से इस प्रकार के डीएनए तैयार करना कुछ सीमा तक सम्भव भी है। इस प्रकार जूरासिक पार्क की कहानी केवल कल्पना ही नहीं बल्कि सच्चाई के काफी निकट भी है। इस प्रकार हम स्पष्ट रूप से यह कह सकते हैं कि जीवाश्म वैज्ञानिकों द्वारा किए जाने वाले जीवाश्म विश्लेषण को मात्र मृतक शास्त्र का नाम नहीं दिया जा सकता है बल्कि उसके द्वारा विश्व का प्राचीनतम इतिहास (जो करोड़ों वर्ष पुराना है), प्राणियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास, महाद्वीपों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन तथा इसी प्रकार के अन्य रोचक तथ्यों का पता लगाया जा सकता है।
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