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समाचारदेश Alert Star Digital Team Aug 24, 2025 08:10 PM

संसद की गरिमा पर अमित शाह का जोर, विपक्ष पर साधा निशाना

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार (24 अगस्त, 2025) को विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि संसद या विधानसभाएं चर्चा और बहस के मंच हैं, लेकिन संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए विरोध के नाम पर सत्र की कार्रवाई को ठप करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

संसद की गरिमा पर अमित शाह का जोर, विपक्ष पर साधा निशाना

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार (24 अगस्त, 2025) को विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि संसद या विधानसभाएं चर्चा और बहस के मंच हैं, लेकिन संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए विरोध के नाम पर सत्र की कार्रवाई को ठप करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। शाह ने यह बात ‘ऑल इंडिया स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस’ को संबोधित करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि मानसून सत्र के दौरान विपक्षी प्रदर्शन और बार-बार स्थगन के कारण सदन में बहुत कम कामकाज हो पाया। शाह के अनुसार, “लोकतंत्र में बहस-मुबाहिसा होना चाहिए, लेकिन दिन-प्रतिदिन या सत्र-दर-सत्र कार्यवाही को रोकना उचित नहीं है। यह देश और संसद, दोनों के लिए नुकसानदेह है।”

संसद की गरिमा और निष्पक्ष बहस की जरूरत

अमित शाह ने कहा कि सदन का संचालन नियमों और मर्यादा के अनुरूप होना चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के तर्क निष्पक्ष हों और जनता के मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर संसद और विधानसभाओं में चर्चा नहीं होगी तो ये भवन “बेजान” हो जाएंगे।

उन्होंने कहा कि अध्यक्ष को सदन की गरिमा बनाए रखने के साथ-साथ सेवक की भूमिका भी निभानी चाहिए। लोकतंत्र में समस्याओं का समाधान विमर्श से ही संभव है और हर कानून का उद्देश्य जनता का कल्याण, समावेशी विकास, प्रशासनिक दक्षता और आंतरिक-बाह्य सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।

विट्ठलभाई पटेल का योगदान याद किया

शाह ने इस अवसर पर केंद्रीय विधान सभा के पहले भारतीय अध्यक्ष और स्वतंत्रता सेनानी विट्ठलभाई पटेल को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने बताया कि 100 साल पहले इसी दिन विट्ठलभाई पटेल को अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

गृह मंत्री ने कहा, “गुजरात ने दो महान व्यक्ति दिए — सरदार पटेल, जिन्होंने आज़ादी आंदोलन में गांधीजी के साथ काम किया और विट्ठलभाई पटेल, जिन्होंने भारत की विधायी परंपराओं और आधुनिक लोकतंत्र की नींव रखी।”

उन्होंने कहा कि विट्ठलभाई पटेल ने स्वतंत्र विधायी विभाग की स्थापना की थी, जिसे बाद में संविधान सभा ने भी स्वीकार किया। शाह ने कहा कि कोई भी विधानसभा निर्वाचित सरकार के अधीन नहीं होनी चाहिए, उसे स्वतंत्र होना चाहिए, तभी वहां होने वाली चर्चाओं की सार्थकता बनी रहती है।

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