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पश्चिम उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और अजित चौधरी के बिना बिछ रही सियासी बिसात
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है। इस बार बड़े-बड़े दिग्गजों के बिना पार्टियां अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो इस बार का चुनाव अजीत सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बिना लड़ा जाना है। ऐसे में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) की चुनावी रणनीति का सारा दारोमदार जयंत चौधरी के कंधों पर है। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह पर कमल खिलवाने की जिम्मेदारी है।
पिछले विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 71 सीटों में से भाजपा ने 51 सीटों पर कब्जा किया था। राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के एकमात्र विधायक सहेंदर सिंह रमाला बाद में भाजपा में शामिल हो गए। समाजवादी पार्टी (सपा) को 16, कांग्रेस को 2 और बसपा को एक सीट से ही संतोष करना पड़ा था। इससे पहले भी रालोद का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा। साल 2014 और 2019 के आम चुनाव में छोटे चौधरी और पोते चौधरी दोनों को ही हार का सामना करना पड़ा था।
रालोद ने साल 2002 में भाजपा के साथ गठबंधन में चुनावी मैदान में प्रवेश किया था। इस चुनाव में रालोद ने 14 सीटें जीती थीं। जबकि 2007 में पार्टी अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। इस चुनाव में पार्टी को 10 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। हालांकि उनका वोट प्रतिशत बढ़कर 4 फीसदी हो गया। 2012 के चुनावों में रालोद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और 9 सीटें (2 प्रतिशत वोट) जीतीं। वहीं 2017 में रालोद ने अकेले चुनाव लड़ा था और एक विधायक को जीत मिली थी, जो चुनाव बाद भाजपा में शामिल हो गया।
ऐसे में जयंत चौधरी के कंधों पर रालोद की नईयां पार लगाने की जिम्मेदारी है। जिसको ध्यान में रखते हुए जयंत चौधरी ने पहले ही समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के साथ हाथ मिला लिया है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की पकड़ अच्छी खासी मानी जाती है।
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