होम जानें कौन हैं ऑपरेशन सिंदूर की शेरनी निकिता पांडे? आखिर क्यों पहुंची सुप्रीम कोर्ट
विंग कमांडर निकिता पांडे भारतीय वायु सेना की एक अनुभवी अधिकारी हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और बालाकोट स्ट्राइक जैसे अहम अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे एक फाइटर कंट्रोलर के तौर पर कार्यरत रही हैं और 13 साल से अधिक की सेवा दे चुकी हैं।
विंग कमांडर निकिता पांडे भारतीय वायु सेना की एक अनुभवी अधिकारी हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और बालाकोट स्ट्राइक जैसे अहम अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे एक फाइटर कंट्रोलर के तौर पर कार्यरत रही हैं और 13 साल से अधिक की सेवा दे चुकी हैं। उन्होंने स्थायी कमीशन (Permanent Commission) के लिए कई मूल्यांकन प्रक्रियाएं पूरी की हैं और अब वे तीसरी और अंतिम चयन बोर्ड से मूल्यांकन की प्रतीक्षा कर रही हैं।
निकिता पांडे ऐसी पहली महिला वायुसेना अधिकारी हैं जिन्हें सेवा से रिलीव करने पर सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिला है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई को भारतीय थल सेना की 50 से अधिक महिला SSC अधिकारियों को भी इसी तरह की राहत दी थी।
विंग कमांडर निकिता पांडे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उन्हें स्थायी कमीशन न देना एक तरह का लैंगिक भेदभाव है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के माध्यम से भारतीय वायुसेना में शामिल होने के बाद, उनकी सेवा अवधि को 10 वर्षों के बाद बढ़ाकर 19 जून 2025 तक किया गया था। अब जबकि उन्होंने 13.5 वर्षों तक निष्ठा और दक्षता के साथ सेवा दी है, उन्हें सेवानिवृत्त होने के लिए कहा जा रहा है। इसका कारण यह बताया गया कि 2019 की एक नीति के तहत उन्हें स्थायी कमीशन के लिए अयोग्य करार दिया गया, जो उनके अनुसार अनुचित और असंवेदनशील है। इसको लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।
विंग कमांडर निकिता पांडे की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और अधिवक्ता आस्था शर्मा ने याचिका दाखिल की। याचिका में दलील दी गई कि निकेता पांडे को ऑपरेशन सिंदूर जैसे उच्च स्तरीय सैन्य अभियानों में उनकी रणनीतिक दक्षता और लंबे अनुभव के चलते चुना गया था, जो यह दर्शाता है कि वे स्थायी कमीशन के लिए पूरी तरह योग्य हैं। इसलिए उन्हें स्थायी कमीशन के लिए चुना जाना चाहिए।
निकिता ने कहा, वायुसेना में महिलाओं की भर्ती 1992 से हो रही है, लेकिन आज भी महिलाओं के पास केवल SSC के जरिए ही भर्ती का विकल्प होता है, जबकि पुरुषों को SSC और स्थायी कमीशन दोनों के विकल्प मिलते हैं। अब समय बदल चुका है, और महिलाओं के पास आवश्यक कौशल, अनुभव और संसाधन हैं, फिर भी सिर्फ लिंग के आधार पर स्थायी कमीशन से वंचित किया जाना अनुचित है।'
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने कहा, सशस्त्र बलों में अनिश्चितता की भावना ठीक नहीं है। SSC अधिकारियों को स्थायी कमीशन का कोई निश्चित मौका न मिलने से उनके बीच अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा होती है, जो मानसिक तनाव और हताशा का कारण बनती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह सुझाव भी दिया कि SSC अधिकारियों की भर्ती संख्या को स्थायी कमीशन के मौकों से जोड़ा जाना चाहिए। कोर्ट का कहना था कि अगर 100 SSC अधिकारी भर्ती होते हैं, तो सभी को स्थायी कमीशन के लिए विचार किया जाए भले ही सभी योग्य न हों।
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