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समाचारदेश Alert Star Digital Team Aug 13, 2022 11:07 PM

भाजपा की ताकत जरूर बढ़ी पर कमोजर हुआ गठबंधन, सहयोगी दलों को नहीं भा रहा वर्चस्व

भाजपा की ताकत जरूर बढ़ी पर कमोजर हुआ गठबंधन, सहयोगी दलों को नहीं भा रहा वर्चस्व

भाजपा की ताकत जरूर बढ़ी पर कमोजर हुआ गठबंधन, सहयोगी दलों को नहीं भा रहा वर्चस्व

देशभर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ताकत बढ़ने के साथ ही उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) कमजोर पड़ा है। दरअसल एनडीए के तमाम क्षेत्रीय सहयोगी दल भाजपा के वर्चस्व को नहीं पचा पा रहे हैं। बीते 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के बैनर तले 21 पार्टियां चुनाव मैदान में थी, उनमें से लगभग आधा दर्जन उससे दूर हो चुकी हैं। सबसे मजबूत और बड़े माने जाने वाले दलों का बाहर जाना अहम है। इनमें जदयू, शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना शामिल है। हालांकि शिव सेना का बड़ा बागी धड़ा भाजपा के साथ लौट आया है।


राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन राजनीति अब कमजोर पड़ रही है। हालांकि सत्तापक्ष और विपक्ष के दो मजबूत गठबंधन अभी भी मौजूद हैं। इनमें भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए है। विपक्ष खासकर कांग्रेस की हालत तो पहले से खराब है। ऐसे में यूपीए भी कमजोर हुआ है, लेकिन एनडीए का कमजोर होना काफी महत्वपूर्ण है। केंद्र व राज्यों में सत्ता में होने के बावजूद उसके विभिन्न घटक अब दूर हो रहे हैं। दरअसल भाजपा की बढ़ती ताकत और एनडीए में उसके वर्चस्व को देखते हुए क्षेत्रीय दलों की दिक्कतें बढ़ी है।

क्षेत्रीय दलों को भाजपा का वर्चस्व भी नहीं भा रहा है, क्योंकि भाजपा उनके वर्चस्व वाले राज्यों में भी अपनी ताकत बढ़ा रही है। यही वजह है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ उसका रिश्ता टूटा था। हाल में जनता दल यू ने भी उससे नाता तोड़ लिया है, जिसके चलते बिहार की गठबंधन सरकार भी गिर गई और विपक्ष सत्ता में आया है। पंजाब में भी भाजपा का पुराना सहयोगी शिरोमणि अकाली दल किसान आंदोलन के चलते उससे दूर हो गया था। गौरतलब है कि यह तीनों ही दल भाजपा के सबसे पुराने और मजबूत साथी रहे हैं। ऐसे में इनका दूर होना एनडीए का कमजोर होना ही माना जाएगा।

भाजपा की एक और सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी भी विभाजित हो चुकी है। हालांकि उसका बड़ा घटक अभी एनडीए में है। अन्नाद्रमुक भी बंट चुकी है। हालांकि वह भी एनडीए के साथ मानी जाती रही है। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद असम का बोडो पीपुल्स फ्रंट, पश्चिम बंगाल का गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, तमिलनाडु के डीएमडीके और गोवा की गोवा फारवर्ड पार्टी उससे दूर हुई है।

एनडीए के कुनबे में अभी लगभग डेढ़ दर्जन दल हैं, लेकिन उनकी बहुत ज्यादा राजनीतिक ताकत नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा को विभिन्न राज्यों में अपने विस्तार का काफी मौका मिलेगा। लेकिन गठबंधन की स्थिति बनने पर उसे दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि विपक्ष में भी मजबूत गठबंधन नहीं होने से भाजपा को फिलहाल बड़ा राजनीतिक नुकसान होता नहीं दिख रहा है।

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