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इस बार के विधानसभा चुनावों में दलबदलुओं को जनता ने अच्छा सबक सिखाया है
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ऐन पहले दलबदल करने वाले ज्यादातर विधायकों का दांव खाली गया और ऐसे 80 प्रतिशत जनप्रतिनिधि सियासी संग्राम में सफलता हासिल नहीं कर सके। दलबदल कर विभिन्न राजनीतिक दलों का हाथ थामने वाले इन 21 विधायकों में से सिर्फ चार को ही जीत नसीब हुई है। हम आपको बता दें कि पाला बदलने वाले इन विधायकों में से 9 भाजपा जबकि 10 सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे। जिन प्रमुख नेताओं को हार का सामना करना पड़ा उनमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य व धर्म सिंह सैनी के अलावा बरेली की पूर्व महापौर सुप्रिया ऐरन शामिल हैं। ये नेता चुनाव से ऐन पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।
उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार में करीब पांच वर्ष तक मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी ने ऐन चुनाव के मौके पर भाजपा पर पिछड़ों और दलितों की उपेक्षा का आरोप लगाकर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और समाजवादी पार्टी में शामिल होकर अखिलेश यादव के नेतृत्व में पिछड़ों को एकजुट करने की मुहिम शुरू की थी लेकिन खुद ही चुनाव हार गये। स्वामी प्रसाद मौर्य ने तो दावा किया था कि वह भाजपा की चूलें हिला देंगे और उसे नेस्तनाबूत कर देंगे लेकिन उनकी खुद की चूलें ऐसी हिल गयी हैं कि लंबे समय तक अब राजनीतिक रूप से वापस खड़े नहीं हो पाएंगे। अखिलेश यादव के समक्ष भी अब स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक हैसियत का खुलासा हो गया है इसीलिए अब वह भी उन्हें शायद पहले की तरह तवज्जो नहीं दें।
उत्तर प्रदेश की ही तरह यदि उत्तराखण्ड की ओर देखें तो वहां भी भाजपा को मटियामेट कर देने के दावे करने वाले यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत खुद ही राजनीतिक रूप से मटियामेट हो गये। उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे यशपाल आर्य मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के चलते कहीं के नहीं रहे। ऐन चुनावों से पहले वह अपने बेटे और भाजपा विधायक संजीव आर्य के साथ पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गये। कांग्रेस ने दोनों विधायक पिता-पुत्र को टिकट भी दे दिया लेकिन बाजपुर विधानसभा सीट से यशपाल आर्य बस हारते-हारते बचे और उनके बेटे संजीव आर्य नैनीताल से चुनाव हार गये। अब यशपाल आर्य के पास विपक्ष में बैठने के अलावा कोई चारा नहीं है। वहीं हरक सिंह रावत की बात करें तो वह भी भाजपा को चुनौती देते हुए चुनावों से पहले पार्टी छोड़ गये थे। हरक सिंह रावत खुद तो चुनाव नहीं लड़े थे लेकिन अपनी पुत्रवधू अनुकृति को कांग्रेस के टिकट पर लैंसडाउन से चुनाव लड़वाया। मगर मोदी लहर को वह भांप नहीं सके और लैंसडाउन से भाजपा जीत गयी। इस तरह हरक सिंह रावत भी अब घर बैठ गये हैं और भाजपा को भी रोजाना रूठने वाले नेताओं से छुटकारा मिल गया है। वहीं ऐन चुनावों के समय कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये किशोर उपाध्याय और सरिता आर्य विधानसभा चुनाव जीत कर विधायक बन गये। किशोर उपाध्याय को तो नयी भाजपा सरकार में मंत्री बनाये जाने के भी आसार हैं।
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