होम रवरी में ही 40 डिग्री पहुंच रहा तापमान, जान लीजिए भीषण गर्मी पड़ने के पीछे क्या है वजह

प्रादेशिकीउत्तर-प्रदेश Alert Star Digital Team Feb 23, 2023 08:56 PM

रवरी में ही 40 डिग्री पहुंच रहा तापमान, जान लीजिए भीषण गर्मी पड़ने के पीछे क्या है वजह

रवरी में ही 40 डिग्री पहुंच रहा तापमान, जान लीजिए भीषण गर्मी पड़ने के पीछे क्या है वजह

रवरी में ही 40 डिग्री पहुंच रहा तापमान, जान लीजिए भीषण गर्मी पड़ने के पीछे क्या है वजह

अभी फरवरी का ही महीना चल रहा है और मौसम कुछ ही दिनों में पूरी तरह से बदल चुका है। पिछले महीने तक जहां कड़ाके की ठंड से कंपकंपी छूट रही थी, तो अब ज्यादातर राज्यों में काफी गर्मी हो रही है।

कई जगह तो तापमान 40 डिग्री को छूने वाला है। सामान्य से अधिक तापमान होने की वजह से माना जा रहा है कि इस बार गर्मी रिकॉर्ड तोड़ने वाली है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, जबकि गुजरात में 40 डिग्री के करीब है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे उत्तर भारत के राज्यों में भी औसत से अधिक पारा पहुंच चुका है, जिससे लोग फरवरी में ही मई जैसी गर्मी झेल रहे हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, अगले दो दिनों में गर्म परिस्थितियों के कम होने की उम्मीद है। लेकिन इसके सामान्य तापमान से ऊपर बने रहने की ही संभावना है। साल 1981 से 2010 तक 30 साल की अवधि के रिकॉर्ड के आधार पर फरवरी में अधिकतम तापमान, पूरे देश में औसत, लगभग 28 डिग्री सेल्सियस रहता है, जिसे सामान्य माना जाता है। न्यूनतम तापमान 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। उत्तर पश्चिम, पश्चिम मध्य और पूर्वी भारत में औसत तापमान बाकी की तुलना में जरूरी कुछ डिग्री अधिक रहता है। हालांकि, पिछले सप्ताह के दौरान, उत्तरी और पश्चिमी भारत के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से 5-11 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र सबसे अधिक गर्म रहे हैं, कुछ स्थानों पर तापमान लगभग 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है।

हालांकि, सबसे ज्यादा खराब स्थिति तो बाकियों की अपेक्षा ठंडे माने जाने वाले उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों की रही है, जहां पर यह 10 से 11 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा रहा है। आमतौर पर इतने ज्यादा तापमान के होने की वजह से इसे हीटवेव (लू) कहा जाता है। यदि मैदानी इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है, या सामान्य से लगभग 4.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है, तो इन क्षेत्रों को हीटवेव का अनुभव करने वाला कहा जाता है। पहाड़ों के लिए, यह दहलीज 30 डिग्री सेल्सियस और तटीय क्षेत्रों के लिए 37 डिग्री सेल्सियस है। इस हिसाब से कई स्थानों पर पिछले कुछ दिनों से लू की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, आईएमडी द्वारा हीट वेव घोषणाएं, जो स्थानीय प्रशासन द्वारा ऐक्शन लिए जाने के लिए ट्रिगर करती हैं, केवल अप्रैल-जुलाई की अवधि के लिए होती हैं, फरवरी या मार्च के लिए नहीं।

आखिर फरवरी में क्यों बढ़ रहा इतना तापमान, क्या है वजह
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मौसम में कोई बड़ा बदलाव आता है, जैसे कि तापमान बढ़ता है या ज्यादा कम हो जाता है तो इसके लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन मौसम में देखी गई असामान्यताएं हमेशा एक निश्चित पैटर्न की वजह से नहीं होती हैं। कई बार मौसम से जुड़ीं यह स्थितियां विभिन्न प्रकार के स्थानीय और अल्पकालिक मौसम संबंधी संयोगों की वजह से होती हैं। फरवरी में पड़ रही भयंकर गर्मी के पीछे मौसम विभाग का कहना है कि ऐसा कई वजहों से हो रहा है। वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की कमी के चलते भी तापमान इतना अधिक बढ़ा है। वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से बारिश होती है, जिससे तापमान में कमी बनी रहती है। अब तक देश के 717 जिलों में से 110 जिलों के ही आंकड़े उपलब्ध हैं, जहां पर फरवरी में सामान्य या फिर इससे अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई। मौसम विभाग ने कहा है कि मैदानी इलाके अपेक्षाकृत सूखे रहे हैं और पहाड़ियों में पहले की तुलना में बारिश या बर्फबारी कम हुई है।

राजस्थान से यूपी तक पड़ रहा एंटीसाइक्लोनिक गठन का असर
IMD के अनुसार, दक्षिण गुजरात के ऊपर एक एंटीसाइक्लोनिक गठन पश्चिमी तट पर वार्मिंग के मुख्य कारणों में से एक है। इसका असर उत्तर की तरफ राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक जा रहा है। महाराष्ट्र और गोवा के आसपास, कोंकण तट पर सामान्य से कम समुद्री हवाएं एंटीसाइक्लोन के प्रभाव को बढ़ा रही थीं। आईएमडी ने कहा कि अगले कुछ दिनों में अधिकांश क्षेत्रों के तापमान में 2-3 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आने की संभावना है। वहीं, विश्व स्तर पर भी इस साल व्यापक रूप से पिछले दो वर्षों की तुलना में थोड़ा गर्म होने की उम्मीद है, मुख्य रूप से सबसे मजबूत ला नीना भी इसके पीछे वजह है। ला नीना भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सामान्य सतह के पानी की तुलना में अधिक ठंडे को रिफर करता है, जो वैश्विक मौसम को प्रभावित करता है।

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