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समाचारदेशप्रादेशिकीदिल्ली Alert Star Digital Team Sep 11, 2024 08:34 PM

अचानक क्यों भंग करनी पड़ी हरियाणा विधानसभा? 63 दिन पहले चली जाएगी नायब सैनी की कुर्सी

अचानक क्यों भंग करनी पड़ी हरियाणा विधानसभा? 63 दिन पहले चली जाएगी नायब सैनी की कुर्सी

अचानक क्यों भंग करनी पड़ी हरियाणा विधानसभा? 63 दिन पहले चली जाएगी नायब सैनी की कुर्सी

हरियाणा में चुनावी दंगल के बीच नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है. दरअसल, विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से अब सरकार संवैधानिक संकट में फंस गई है.

कहा जा रहा है कि संकट से निपटने के लिए सरकार ने विधानसभा भंग का फैसला किया है.

राज्यपाल अगर ये सिफारिश मान लेते हैं और विधानसभा भंग हो जाती है तो देश के इतिहास में यह पहली बार होगा, जब कोई सरकार सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से गिर जाएगी. सैनी की वर्तमान सरकार का कार्यकाल 3 नवंबर तक है.

सत्र बुलाने में फेल रही सैनी सरकार

भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 में कहा गया है कि कैबिनेट की सिफारिश पर राज्यपाल को सत्र बुलाने का अधिकार है, लेकिन दो सत्रों के बीच 6 महीने से ज्यादा का गैप न हो. अगर ऐसा होता है तो विधानसभा को भंग करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

नायब सिंह सैनी की सरकार ने 13 मार्च 2024 को आखिरी बार विधानसभा का सत्र बुलाया था. इसके बाद सरकार की तरफ से कई बार सत्र बुलाए जाने की बात कही गई, लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जा सका. सत्र बुलाने की आखिरी डेडलाइन 12 सितंबर है.

कहा जा रहा है कि अब यह संभव नहीं है, जिसके कारण सैनी की सरकार ने विधानसभा भंग करने का फैसला किया है. कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल विधानसभा को भंग कर देंगे. हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल वर्तमाना में 3 नवंबर तक था.

बड़ा सवाल- सरकार ने सत्र क्यों नहीं बुलाया?

विधानसभा भंग करने की जो नौबत आई है, उसकी बड़ी वजह सरकार के पास पूर्ण बहुमत न होना है. हरियाणा में विधानसभा की 90 सीटें हैं, जहां पर सरकार को स्थिर रखने के लिए 46 विधायकों की जरूरत पड़ती है. 2019 में बीजेपी को 40 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन पार्टी ने उस वक्त 10 सीटों वाली जेजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली थी.

मार्च में बीजेपी और जेजेपी का गठबंधन टूट गया. वर्तमान में 2 विधायक रणजीत चौटाला और लक्ष्मण नापा पार्टी का दामन छोड़ चुके हैं, जबकि बीजेपी ने 15 विधायकों का टिकट काट दिया है. इनमें 2 मंत्री भी शामिल हैं.

सरकार अगर अभी विधानसभा का सत्र बुलाती है तो इन विधायकों की नाराजगी खुलकर सामने आ जाती, इसलिए कहा जा रहा है कि सैनी सरकार ने किरकिरी से बचने के लिए विधानसभा भंग करने का ही फैसला लिया है.

मनोहर लाल खट्टर भी एक वजह

समय से पहले विधानसभा भंग करने की जो नौबत आई है, उसकी एक वजह पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर भी हैं. दरअसल, सरकार के एंटी इनकंबैंसी को कम करने के लिए मार्च में बीजेपी हाईकमान ने मनोहर लाल खट्टर को हटाने का फैसला किया.

मनोहर लाल खट्टर के हटाने की वजह से बीजेपी को जेजेपी से भी गठबंधन तोड़ना पड़ा. इसके बाद से ही सरकार अल्पमत में आ गई. कई बार हरियाणा विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष भूपिंदर हुड्डा ने इसको लेकर सवाल उठाया लेकिन हर बार सरकार बहुमत का दावा करती रही.

लोकसभा के बाद मानसून सत्र बुलाने की भी बात कही गई, लेकिन सरकार ने कैबिनेट की मीटिंग में इसे भी होल्ड कर दिया. विधानसभा सत्र बुलाने से ज्यादा सरकार योजनाओं की घोषणा और फील्ड में काम पर फोकस करती रही.

भंग करने के बाद राज्यपाल क्या करेंगे?

बहुमत न होने या कैबिनेट की अनुशंसा पर राज्यपाल विधानसभा भंग कर सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 174 में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है. विधानसभा तब तक भंग रहता है, जब तक चुनाव के जरिए नई सरकार का गठन नहीं हो जाता है. विधानसभा भंग होने के बाद प्रशासनिक शक्ति राज्यपाल के पास चली जाती है.

कई बार विधानसभा भंग होने के बाद राज्यपाल केयरटेकर मुख्यमंत्री बनाते हैं और कई बार नहीं. मसलन, 2018 में तेलंगाना विधानसभा के भंग होने के बाद वहां पर केसीआर को कुछ महीनों के लिए केयरटेकर मुख्यमंत्री बनाया गया था.

इसी तरह कश्मीर में जब विधानसभा भंग किया गया था, तब किसी को भी केयरटेकर मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था. हालांकि, कहा जा रहा है कि हरियाणा में 8 अक्टूबर तक नई सरकार की तस्वीर साफ हो जाएगी.

ऐसे में राज्यपाल वर्तमान मुख्यमंत्री को ही तब तक के लिए केयरटेकर मुख्यमंत्री रहने के लिए कह दे.

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