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समाचारविदेश Alert Star Digital Team Jul 8, 2021 08:03 PM

मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार के ये पाँच अहम संदेश

मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार के ये पाँच अहम संदेश

मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार के ये पाँच अहम संदेश

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई टीम की चर्चा हर जगह है. चर्चा के मुख्य बिंदु हैं :

• नई कैबिनेट में 27 ओबीसी, 12 एससी और 11 महिलाएँ

• नई टीम में 41 मंत्री- वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और एमबीए हैं

• 77 मंत्रियों में 36 मंत्री नए हैं यानी लगभग 50 फ़ीसदी

ये तमाम बातें वो हैं, जो बीजेपी और सरकार मीडिया के सामने पेश कर रही है.

जो बात अब तक बताई नहीं गई और सरकार ने स्वीकार नहीं की, वो इससे बिल्कुल अलग है.

यही वजह है कि चर्चा उन पुरानी टीम के सदस्यों की ज़्यादा है, जिनकी छुट्टी कर दी गई है.

इससे पहले टीम मोदी की औसत उम्र 62 साल थी, जो अब घट कर 58 हो गई है. एक दौर में एनडीए सरकार में ये औसत उम्र 59 साल भी रही थी.

ऐसा भी नहीं कि इससे पहले सरकार में पीएचडी, डॉक्टर, इंजीनियर और एमबीए किए मंत्री नहीं थे.

ये भी सच है कि इससे पहले मनमोहन सरकार में 10 महिलाएँ मंत्री रह चुकी हैं.

तो क्या ये सरकार की छवि सुधारने की कोशिश है या फिर कुछ और. इसलिए सबसे पहले बात कोरोना महामारी की.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की पत्रकार निस्तुला हेब्बार पिछले 17 साल से बीजेपी कवर कर रहीं है. उनसे पूछा कि क्या स्वास्थ्य मंत्री को हटाकर मोदी सरकार ने ये मान लिया कि कोरोना महामारी को ठीक से हैंडल नहीं किया गया?

इस सवाल के जवाब में निस्तुला कहतीं है, "सरकार ने बीच राह में खु़द को सुधारने की कोशिश ज़रूर की है. सरकार में ये धारणा किसी की नहीं है कि कोरोना को उन्होंने बहुत बढ़िया तरीक़े से हैंडल किया. सभी को लगता है कि इमेज मैनेजमेंट, परसेप्शन मैनेजमेंट से लेकर लोगों तक अपनी बात पहुँचाने (कम्युनिकेशन) में कई दिक़्क़तें आईं. कुछ फेरबदल कर उन कमियों को स्वीकारते हुए, उन्हें दुरुस्त करने की कोशिश की गई है.''

''लेकिन ये भी सच है कि ऐसी महामारी में कुछ दिक़्क़तें हमेशा रहेंगी. इसलिए पूरा दोष सरकार ने अपने सिर पर एक तरह से नहीं लिया. सरकार को महामारी के साथ-साथ अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में भी सोचना था. अगले साल उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे छह राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. साथ ही 2024 का लोकसभा चुनाव भी सामने है."

नकारात्मकछवि सुधारने की कोशिश

शरद गुप्ता अमर उजाला के राजनीतिक मामलों के संपादक हैं. वो इस मंत्रिमंडल विस्तार को दूसरे नज़रिए से देखते हैं.

वह कहते हैं, "जिस सरकार में सीबीएसई की परीक्षा कैंसल होने का एलान प्रधानमंत्री करते हों और शिक्षा मंत्री से फिर इस्तीफ़ा ले लिया जाता हो. जिस देश में वैक्सीन कब आएगी, कब किसे लगेगी, क्या दवा चाहिए, कब आएगी, कैसे आएगी - इस पर फ़ैसला ख़ुद प्रधानमंत्री करते हों और फिर स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफ़ा हो जाता हो, तो इसका मतलब ये है कि सारा खेल परसेप्शन मैनेजमेंट का है.''

''पीएम मोदी का ये पुराना सिद्धांत है, जब छवि पर आँच आए, तो लोगों को बदल दो. गुजरात में निगम चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक उन्होंने यही किया. ऐसा करने से उनको लगता है कि सत्ता विरोधी लहर थोड़ी कम हो जाती है.''

शरद गुप्ता कहते हैं, ''यही उन्होंने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में किया. लेकिन छत्तीसगढ़ में वो हार गए. गुजरात में वो हारते-हारते बचे. दिल्ली में हारे, महाराष्ट्र में हारे. मध्य प्रदेश हारने के बाद जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई. पिछले दो तीन साल में मोदी सरकार के लिए बहुत कुछ अच्छा नहीं हुआ है. और अब महँगाई आसमान छू रही है. इसलिए ये पूरी क़वायद अपनी असफलताओं को अपने मंत्रियों को सिर पर फोड़ने के अलावा और कुछ नहीं है. सरकार की छवि सुधारने की ये एक कोशिश मात्र है."

हालाँकि कई दूसरे जानकार नई टीम की पूरी क़वायद को इस नज़रिए से भी देखते हैं कि सरकार मोदी-शाह को चलानी है, मंत्री चाहे जो भी हों.

कुछ बड़े मंत्रियों को हटाने के बाद अब नियंत्रण पूरी तरह से पीएमओ के हाथ में ही रहेगा. पहले की स्थिति और अब की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं है.

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