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ड्रैगन के निशाने पर पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठन, उग्रवाद के पीछे चीन का हाथ!
अरुणाचल प्रदेश के तिरप सेक्टर में मंगलवार को उग्रवादियों ने घात लगाकर असम राइफल के जवान की हत्या कर दी. इस घटना से पूर्वोत्तर में उग्रवाद को बढ़ावा देने के लिए चीन की भूमिका फिर चर्चाओं में है.
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (इसाक-मुइवा) द्वारा मंगलवार को किया गया यह हमला भारत और ताइवान के साथ एक व्यापारिक समझौते के ठीक एक सप्ताह बाद हुआ.
भारत और ताइवान के बीच बढ़ते व्यपारिक रिश्तों से बौखलाया चीन
चीन ने ताइवान के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार को चेतावनी दी. चीन ने धमकी देते हुए कहा कि बीजिंग उत्तर-पूर्व अलगाववादियों का समर्थन करके जवाबी कार्रवाई कर सकता है और सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में मान्यता देना बंद कर सकता है.
अलगाववादी संगठनों से बीजिंग का रहा है पुराना नाता
भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम द्वारा हमले का यह समय संभवतः एक संयोग था, लेकिन चीनी राज्य मीडिया की चेतावनी ने उत्तर-पूर्वी विद्रोही समूहों और बीजिंग के बीच संबंध की परतें खोल दी हैं. अतीत में एनएससीएन-आईएम का लंबे समय तक चीनी राज्य के नेताओं से लंबा संबंध रहा है.
यद्यपि चीनी स्थापना की तारीखों में नागा और मणिपुर विद्रोहियों के बीच संबंध 1971 के युद्ध से बहुत पहले के हैं. 1975 में भारत सरकार और नागा नेशनल काउंसिल के बीच शिलॉन्ग समझौते का एसएस खापलांग और थिंगालेंग शिवा जैसे नेताओं ने विरोध किया था, जो तब चाइना रिटर्न गैंग कहलाते थे.1980 में खापलांग और मुइवा ने मिलकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (NSCN) का गठन किया.
आठ साल बाद 1988 में इसाक मुइवा ने चिशी स्वू के साथ एनएससीएन (आई-एम) गुट का गठन किया जबकि खापलांग ने अपने गुट को एनएससीएन (के) नाम दिया.
अलगाववादी संगठनों का चीन संबंधों से इनकार
उल्लेखनीय है कि एनएससीएन (आई-एम), जो वर्तमान में नागा मुद्दे के समाधान के लिए सरकार के साथ बातचीत कर रहा है, का कहना है कि उसका चीनी सरकार से कोई संबंध नहीं है.
हालांकि, एनएससीएन (आई-एम) के इस दावे का सुरक्षा अधिकारियों और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने जमकर विरोध किया है.
एनएससीएन (आई-एम) के सह-संस्थापक चिशी स्वू ने आखिरी बार 2009 के अंत तक बीजिंग की एक शांति यात्रा की थी, जिनकी 2016 में मृत्यु हो गई,
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