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दुनिया में पहली बार पुल की तरह वैक्सीन खोज की डेडलाइन
भारत और दुनिया भर के लिए कोविड-19 पर नियंत्रण करने वाला वैक्सीन बनाने की बड़ी चुनौती है। इस दिशा में काफी काम हो रहा है। हजारों लोग कोविड-19 के शिकार हो रहे हैं और इस वायरस से सुरक्षा वाले वैक्सीन को लेकर सकारात्मक सूचना सुनने की प्रतीक्षा लाखों लोग कर रहे हैं। लेकिेन इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने जिस तरह घरेलू भागीदारी से 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन बनाने के लिए 15 अगस्त की डेडलाइन तय की है, उससे हंगामा खड़ा हो गया है।
इसे बनाने और इस पर मानव ट्रायल करने में लगे संबद्ध भागीदार और 12 अस्पतालों को सरकारी, आंतरिक पत्र के जरिये आईसीएमआर प्रमुख डॉ. बलराम भार्गव के 'निर्देश' का संदेश वैज्ञानिक समुदाय के बीच अच्छा नहीं गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह सत्ता की उच्चस्थ शक्तियों के इशारे पर किया गया है।
विपक्ष के आरोपों को इस बात से भी बल मिला है कि मई के पहले सप्ताह में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने कहा था कि कोविड19 के खिलाफ वैक्सीन जुलाई-अगस्त में हैदराबाद से आएगा। लॉकडाउन से संबंधित मामलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत के दौरान राव ने कथित तौर पर यह बात कही थी और यह बात चर्चा में भी रही थी। इस घरेलू वैक्सीन को हैदराबाद के भारत बायोटेक ने पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) और आईसीएमआर के साथ मिलकर तैयार किया है।
लेकिेन आईसीएमआर की चिट्ठी की स्याही सूखती, इससे पहले ही कई वैज्ञानिकों और इंडियन नेशनल साइंस अकादमी (आईएनएसए), इंडियन एकेडमी ऑफ साइसेंज (आईएएससी)- जैसे वैज्ञानिक संगठन इसके खिलाफ खुलकर आगे आए और यह बात रेखांकित किया कि डेडलाइन किस तरह अव्यावहारिक है और अगर इस पर जोर दिया गया, तो यह कैसे भारतीय विज्ञान की छवि को नुकसान पहुंचाएगा।
अकादमी ने एक बयान जारी किया और कहा कि ऐसा वह सार्वजनिक हित में कर रही है। इसमें वैक्सीन तैयार करने के लिए 42 दिनों का लक्ष्य तय करने पर उसने आईसीएमआर की आलोचना की और कहा कि कठोर वैज्ञानिक प्रक्रियाओं और स्तरों के साथ समझौता कर जल्दबाजी में किए गए समाधान का भारत के नागरिकों पर अनदेखे स्तर के दीर्घजीवी विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है।
इस तरह की प्रतिक्रियाओं के बाद केंद्र सरकार ने अपने रुख में थोड़ा बदलाव किया। पहले तो आईसीएमआर ने खुद ही कहा कि 15 अगस्त की डेडलाइन कोविड-19 की अप्रत्याशित प्रकृति के मद्देनजर और वैश्विक रुख के तहत ट्रायल की गति बढ़ाने के लिए तय की गई थी। इसका उद्देश्य वैधानिक अनिवार्यताओं की अनदेखी किए बिना अनावश्यक लालफीताशाही को खत्म करना था। इसका लक्ष्य ह्यूमन ट्रायल के दो चरणों को यथाशीघ्र पूरा करना और आबादी को लेकर अध्ययनों को बिना देर किए करना था।
लेकिेन प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. गगनदीप कांग ने गत 6 जुलाई को जिस तरह फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंसेस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक-पद से इस्तीफा दिया, उससे यह विवाद गहरा ही गया लगता है। डॉ. कांग ने हालांकि इसका कारण व्यक्तिगत बताया है, पर यह बात ध्यान में रखनी है कि अभी उनका एक साल का कार्यकाल बचा हुआ था। वह न सिर्फ कोविड-19 की टेस्टिंग से संबद्ध काम में लगी हुई थीं, बल्कि वह ऐसी राष्ट्रीय समिति की प्रमुख भी थीं जो देसी दवाओं और वैक्सीन के विकास को दिशा दे रही थी। इस समिति का काम दो माह पहले बंद कर दिया गया।
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