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श्रम कानूनों में बदलाव पर मचा हंगामा
अगर ये कहा जाए, कि दुनिया को चलाने में मुख्य भूमिका मजदूरों की होती है तो ये कहना गलत नहीं होगा। हम जो खाते हैं, हम जिस घर में रहते हैं, जिस सड़क पर चलते हैं उन सब में तमाम साम्रगियों के साथ-साथ मजदूरों का पसीना मिला होता है।
यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार, मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान की सरकार, गुजरात की विजय रूपाणी सरकार इन सभी ने श्रमिकों को लेकर एक कदम उठाया है। ये कदम उठाने के पीछे दलील दी गई कि रोजगार पनपे और उद्योग-धंधे खूब फले-फूले। लेकिन सवाल उठाने वाले कह रहे हैं कि जो कदम इन सरकारों द्वारा उठाए गए हैं वो श्रमिक विरोधी हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठन भारतीय मजदूर संघ भी इस फैसले की मुखालिफत करते हुए पूरे देश में आंदोलन की तैयारी में है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 7 मई को एक अध्यादेश लाकर 38 श्रम कानूनों पर 3 साल के लिए रोक लगा दी है। ये कानून उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों के हक से जुड़े थे। इस अध्यादेश का नाम है ‘उत्तर प्रदेश अस्थायी श्रम कानूनों से छूट अध्यादेश, 2020’ जिसके तहत मजदूरों के हक में काम करने वाले कई कानूनों पर अगले तीन वर्षों तक रोक रहेगी। इस कथित राहत का लाभ नये और पुराने दोनों तरह के उद्योगों को मिलेगा। इसके नोटिफिकेशन के बाद तीन साल तक इन संस्थाओं में श्रम कानूनों को लेकर कोई जांच आदि नहीं होगी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह नोटिफिकेशन यूपी में लागू हो जाएगा।ष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इस कानून के तहत औद्योगिक विवादों को निपटाने, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों के स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति तथा ट्रेड यूनियनों, कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर और प्रवासी मजदूरों से संबंधित अन्य सभी श्रम कानून निष्प्रभावी हो जाएंगे।राज्य में मजदूरों से जुड़े सिर्फ चार कानून रहेंगे। जिनमें जिसमें भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम, 1996; कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923; बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976; और मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 की धारा 5 (समय पर मजदूरी प्राप्त करने का अधिकार) शामिल है।
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