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वरुण गांधी के बेमेल बयान या विरासत के संघर्ष का खतरा?
तो भाजपा से नाराज वरुण गांधी के लिए कांग्रेस में गुंजाइश नहीं है. उनसे जुड़े सवाल को कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने मल्लिकार्जुन खरगे पर टाल दिया था. लेकिन मंगलवार को होशियारपुर में राहुल ने साफ कर दिया कि उनकी और वरुण की विचारधारा अलग है और उनको यहां (कांग्रेस के साथ) दिक्कत होगी.
लम्बे अरसे से वरुण गांधी अपने बयानों से भाजपा की सरकारों और उसके नेतृत्व को घेरते रहे हैं. अपनी ही सरकार के आलोचकों की जब – तब उनके मुख से प्रशंसा भी साफ जाहिर करती है कि भाजपा से उनके रिश्ते अंत की ओर हैं. फिर वे कहां जाएंगे ? कुछ दिनों पहले उन्होंने बयान दिया था कि उन्हें पंडित नेहरू से कोई शिकायत नहीं है. कांग्रेस से भी ऐतराज नहीं है.
इस बयान को कांग्रेस की ओर उनके बढ़ते कदमों के तौर पर देखा गया. इसमें दो खेमों में बंटे परिवार में सुलह की संभावनाएं भी पढ़ी गईं. संकट के दौर से गुजरती कांग्रेस पार्टी के शुभचिंतकों को वरुण के जुड़ाव से खासतौर से उत्तर प्रदेश में संजीवनी हासिल होने की गुंजाइश नजर आ रही थी. राहुल के जबाब के बाद उस पर विराम लग गया है. असलियत में वरुण को कांग्रेस में शामिल करने पर फैसला लेना इतना आसान नहीं है. वे महज एक विपक्षी सांसद नहीं हैं , जो कांग्रेस से जुड़ने के बाद राहुल -सोनिया – प्रियंका का अनुकरण करने लगेंगे।
40 साल पहले घर छोड़ा था कांग्रेस ने ?
वरुण उस परिवार के सदस्य हैं जिसकी राजनीतिक विरासत पर फिलहाल राहुल गांधी का कब्जा है. इसी विरासत के संघर्ष में वरुण को गोद में लिए मेनका गांधी 40 साल पहले सास इंदिरा गांधी के घर से बाहर निकली थी. परिवार से बाहर होने के बाद राजनीति में उनके विकल्प सीमित थे. पहले उन्होंने अपनी पार्टी संजय विचार मंच बनाई. फिर जनता पार्टी और जनता दल से गुजरते हुए 2004 में वे भाजपा से जुड़ गईं थीं. वरुण की परवरिश और अब तक का राजनीतिक सफर सोनिया – राहुल और कांग्रेस की राजनीति के विरोध के बीच बीता है. इसमें पारिवारिक गांठे भी शामिल हैं. वरुण को कांग्रेस में शामिल करके सोनिया -राहुल उस अध्याय को क्यों खोलना चाहेंगे जो चालीस साल पहले बंद हो चुका है ?
वरुण क्या अपनी पार्टी बना सकते हैं ?
फिर वरुण के पास क्या विकल्प हैं ? कभी वे ममता बनर्जी की तारीफ के कारण तृणमूल कांग्रेस की ओर बढ़ते नजर आते हैं. तो कभी अखिलेश यादव की प्रशंसा के उनके बयान पर सपा के नजदीक आने की अटकलें लगने लगती हैं. वरुण तीसरी बार उत्तर प्रदेश से लोकसभा में हैं. 2009 और 2019 में वे पीलीभीत से चुने गए. बीच में 2014 में सुल्तानपुर से. जाहिर है कि उनकी राजनीतिक जमीन उत्तर प्रदेश में है. तृणमूल कांग्रेस उन्हें उत्तर प्रदेश में कुछ दे नहीं सकती, हालांकि उससे जुड़कर भीड़ खींचने की अपनी क्षमता के कारण वे उसे कुछ आधार दे सकते हैं. अगर वरुण पर किसी अन्य पार्टी को खड़ा करने का भार आता है तो वे किसी अन्य नेता का नेतृत्व स्वीकार करने की जगह अपनी कोई पार्टी क्यों नहीं खड़ी करना चाहेंगे ?
सारे कयास वरुण के बयानों की देन
वरुण ने खुद अभी तक किसी अन्य पार्टी में शामिल होने का इरादा सार्वजनिक नहीं किया. सारे कयास उनकी भाजपा से दूरियों और विपक्षियों की प्रशंसा से जुड़े बयानों पर टिके हैं. उनका सबसे ताजा बयान अखिलेश यादव की तारीफ में है. सपा की असली ताकत उत्तर प्रदेश में है. फिलहाल अखिलेश और उनकी पार्टी प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी है. 2022 में वे असफल हो गए थे. 2027 में वे फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे.
भाजपा में रहते वरुण गांधी भी इस कुर्सी के दावेदार थे. मान लिया जाए कि बदले हालात में वरुण इसे भूल चुके हैं , तब भी अखिलेश ऐसे हम उम्र चेहरे को क्यों साथ लेना चाहेंगे जिसके पास देश के शिखर राजनीतिक परिवार का आभामंडल और भारी भीड़ खींचने का आकर्षण है और जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकता है. वरुण की छवि ऐसे नेता की है , जो अपनी शर्तों पर राजनीति करते हैं. जाहिर है कि उन्हें साथ लेने वाली पार्टी और उसके नेता इस जोड़ -घटाव के बाद ही उन्हें स्वीकार करेंगे।
वरुण से जुड़ा पुराना विवाद सपा की राह में रोड़ा!
सपा से उनके जुड़ाव में वरुण से जुड़ा एक पुराना विवाद भी आड़े आ सकता है. हालांकि 2009 के बाद से वरुण ने खुद को ऐसे उत्तेजक बयानों से दूर रखा है लेकिन अतीत उन पर चस्पा है. 2009 में पीलीभीत के पहले चुनाव में अपने मुस्लिम विरोधी बयानों के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था. बाद में वे अदालत से बरी भी हो गए थे. उत्तर प्रदेश में बहुसंख्य मुस्लिम मतदाताओं का सपा को समर्थन रहा है. 1989 से मुलायम सिंह यादव ने खुद को सेक्युलर ताकतों के चैंपियन के तौर पर पेश किया.
अखिलेश यादव ने भी उस सिलसिले को आगे बढ़ाया. इन दिनों प्रदेश की राजनीति में फिर से बसपा को खड़े करने की कोशिशों में लगी मायावती मुस्लिमों को रिझाने के अभियान में हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को मुस्लिम मतों का तकरीबन एकमुश्त साथ मिला था. लेकिन ऐसे मुस्लिम लीडरों की संख्या इस बीच बढ़ी है जिन्हें अखिलेश यादव से शिकायत है कि मुस्लिम समाज के प्रबल समर्थन के बाद भी वे उनसे दूरी बनाकर चलते हैं . ऐसे में इस मुकाम पर अखिलेश यादव उन वरुण गांधी जैसे बड़े चेहरे जिनकी राजनीतिक पारी का श्रीगणेश उग्र हिंदुत्व के पैरोकार के तौर पर हुआ, को साथ लेकर विरोधियों को क्यों मौका देना चाहेंगे ?
वरुण कभी मोदी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सके
भाजपा के विरोध के सवाल पर वरुण जितनी दूरी तय कर चुके हैं , वहां से उनकी वापसी की गुंजाइश नजर नहीं आती. पार्टी और सरकार पर उनके लगातार प्रहारों के बाद भी नेतृत्व ने खामोशी अख्तियार कर रखी है. मेनका जिस दौर में भाजपा से जुड़ीं और फिर 2004 के चुनाव जब वरुण पार्टी के पक्ष में प्रचार करने निकले , तब की भाजपा को गांधी परिवार के दूसरे खेमे की जरूरत थी. मोदी -शाह के दौर की भाजपा से वरुण संगत नहीं बिठा सके.
असलियत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को उन्होंने कभी स्वीकार ही नहीं किया तो दूसरी तरफ मोदी -शाह ने उन्हें दरकिनार कर आम सांसदों की सूची में शामिल कर दिया. फिर 2019 में उनकी मां मेनका गांधी को मंत्रिमंडल में न लेकर किनारे किया. दोनो को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर किया. इस बीच मेनका ने ऐलान किया है कि 2024 का चुनाव वे एक बार फिर सुल्तानपुर से ही लड़ेंगी. वरुण के भाजपा से दूर होने के बाद क्या मेनका भाजपा से जुड़ा रहना चाहेंगी या भाजपा उन्हें टिकट देगी ? 2004 में मेनका ने वरुण का राजनीतिक रास्ता तय किया था. 2024 के लिए यह जिम्मेदारी वरुण पर है, जब वे अपने साथ अपनी मां की भी आगे की राजनीतिक यात्रा तय करेंगे.
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