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समाचारदेशविचारकानून Alert Star Digital Team Jan 16, 2026 03:15 PM

14 साल जेल में रहने के बाद बरी हुआ शख्स, हाई कोर्ट ने जज की क्लास लगाई, बताया कहां हुई बड़ी चूक

केरल हाई कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए एक शख्स की आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। यह व्यक्ति पिछले 14 सालों से जेल की सलाखों के पीछे था।

14 साल जेल में रहने के बाद बरी हुआ शख्स, हाई कोर्ट ने जज की क्लास लगाई, बताया कहां हुई बड़ी चूक

केरल हाई कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए एक शख्स की आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। यह व्यक्ति पिछले 14 सालों से जेल की सलाखों के पीछे था। अदालत ने अपने फैसले में निचली अदालत (सेशन कोर्ट) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और माना कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का मौका ही नहीं मिला। कोर्ट ने पाया कि मुकदमे के दौरान ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई जिससे न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

जज ने खुद ही सरकारी वकील की भूमिका निभा दी

जस्टिस राजा विजयराघवन और जस्टिस के. वी. जयकुमार की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उसे ऐसे मुकदमे का सामना करना पड़ा, जो टुकड़ों-टुकड़ों में चलाया गया था। कोर्ट ने सेशन कोर्ट की सुनवाई के दौरान जज की खामियों को उजागर किया। रिकॉर्ड से यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि सेशन कोर्ट के जज ने पब्लिक प्रोसेक्यूटर (सरकारी वकील) की अनुपस्थिति में खुद उनकी भूमिका निभाई और मुख्य जिरह (Chief Examination) खुद की। हाई कोर्ट ने 12 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि सेशन कोर्ट के जज का दृष्टिकोण 'अवैध और अनुचित' था क्योंकि अभियोजन पक्ष के गवाहों से अभियुक्तों की अनुपस्थिति में पूछताछ की गई थी।

आरोपी के पास वकील नहीं, खुद करनी पड़ी जिरह

हाई कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मुकदमे की एक महत्वपूर्ण अवधि के दौरान आरोपी का प्रतिनिधित्व किसी सक्षम वकील ने नहीं किया था। हालात ये थे कि उसे अहम गवाहों से जिरह खुद करनी पड़ी। मामले को जुलाई 2012 में सेशन कोर्ट भेजा गया था और आरोपी को अक्टूबर 2019 में दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई। बेंच ने नोट किया कि सात साल की सुनवाई अवधि के दौरान, आरोप तय होने के बाद मामले को सौ से अधिक बार स्थगित किया गया। अदालत ने सत्र न्यायाधीश की ओर से इसके लिए दिए गए कारणों को 'अनुचित और बाध्यकारी नहीं' करार दिया।

क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, यह घटना 18 सितंबर 2011 की है। कोट्टायम जिले के पम्पाडी के पास ओणम उत्सव के दौरान ताश खेल रहे दो समूहों के बीच कहासुनी हो गई थी। आरोप था कि इसी दौरान आरोपी ने पीड़ित को चाकू मार दिया, जिसकी बाद में चोटों के कारण मौत हो गई थी। निचली अदालत ने उसे हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे अब प्रक्रियागत खामियों के चलते हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है।

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