होम क्या ईरान दुनिया का इंटरनेट बंद कर सकता है? समुद्र के नीचे केबल काटने की आशंका से भारत समेत पूरी दुनिया में बढ़ी टेंशन
मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच अब एक नई चिंता सामने आई है। आशंका जताई जा रही है कि ईरान समुद्र के नीचे बिछी वैश्विक इंटरनेट केबल्स को निशाना बना सकता है। यदि ऐसा होता है तो भारत समेत दुनिया के कई देशों में इंटरनेट सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच अब एक नई चिंता सामने आई है। आशंका जताई जा रही है कि ईरान समुद्र के नीचे बिछी वैश्विक इंटरनेट केबल्स को निशाना बना सकता है। यदि ऐसा होता है तो भारत समेत दुनिया के कई देशों में इंटरनेट सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं। विशेषज्ञ इसे अचानक लिया गया फैसला नहीं बल्कि लंबे समय से तैयार की गई रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।
28 फरवरी 2026 को जैसे ही अमेरिका और इजरायल की एयरस्ट्राइक शुरू हुई, ईरान ने अपने देश का बाहरी इंटरनेट लगभग पूरी तरह बंद कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार देश से बाहर जाने वाला इंटरनेट ट्रैफिक करीब 99 प्रतिशत तक गिर गया। इस कदम ने दुनिया को चौंका दिया, लेकिन इससे यह संकेत मिला कि ईरान पहले से डिजिटल अलगाव की तैयारी कर चुका था।
ईरान के पास National Information Network (NIN) नाम का घरेलू इंटरनेट सिस्टम है, जिसे इस तरह विकसित किया गया है कि वैश्विक इंटरनेट ठप होने पर भी देश के अंदर जरूरी सेवाएं जारी रहें। इस नेटवर्क के जरिए सरकारी वेबसाइट, बैंकिंग सेवाएं और आंतरिक संचार बिना रुकावट चलते रहते हैं। बाहरी इंटरनेट बंद होने के बाद अफ्रानेट जैसे घरेलू नेटवर्क पर ट्रैफिक तेजी से बढ़ गया, जिससे साफ हुआ कि देश पूरी तरह डिजिटल अंधेरे में नहीं गया बल्कि खुद को दुनिया से अलग कर लिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार इस सिस्टम की योजना 2010 के आसपास बनाई गई थी, जिसमें चीन की टेक कंपनी Huawei की अहम भूमिका रही। बताया जाता है कि यह प्रोजेक्ट 700 मिलियन से 1 बिलियन डॉलर की लागत से विकसित हुआ। NIN मुख्य रूप से Deep Packet Inspection (DPI) तकनीक पर आधारित है। हालांकि यह नेटवर्क अभी पूरी तरह सक्षम नहीं माना जाता और करीब 60 प्रतिशत ही ऑपरेशनल बताया गया है। जुलाई 2025 के युद्ध के दौरान हजारों साइबर हमले और जनवरी 2026 के विरोध प्रदर्शनों के समय बैंकिंग सिस्टम प्रभावित होने की घटनाएं भी सामने आई थीं।
दुनिया का अधिकांश इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर केबल्स के जरिए चलता है, जिनमें से कई मिडिल ईस्ट क्षेत्र से गुजरती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान दो प्रमुख चोकप्वाइंट्स — रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज — को निशाना बना सकता है। रेड सी में 17 प्रमुख सबमरीन केबल्स हैं, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ती हैं। वहीं स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में AAE-1, FALCON, Gulf Bridge International और Tata-TGN Gulf जैसी अहम केबल्स मौजूद हैं।
2024 में रेड सी में केबल कटने की घटना के बाद मरम्मत में करीब छह महीने लगे थे। युद्ध क्षेत्र होने की स्थिति में रिपेयर शिप्स का पहुंचना और भी मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेवल माइंस, जहाजों के एंकर या अंडरवाटर सबोटाज के जरिए इन केबल्स को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
1 मार्च 2026 को ईरानी ड्रोन द्वारा UAE और बहरीन में Amazon Web Services (AWS) की तीन सुविधाओं पर हमले की खबरों ने चिंता और बढ़ा दी। इसे पहली बार माना जा रहा है जब क्लाउड डेटा सेंटर सीधे निशाने पर आए। इसके चलते बड़े टेक और AI प्रोजेक्ट्स भी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
भारत का लगभग एक-तिहाई पश्चिम की ओर जाने वाला इंटरनेट ट्रैफिक होर्मुज रूट से गुजरता है। यदि यहां केबल्स को नुकसान पहुंचता है तो देश में इंटरनेट स्पीड, क्लाउड सेवाएं और टेक उद्योग पर बड़ा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना के पास फिलहाल तत्काल मरम्मत के लिए समर्पित केबल रिपेयर शिप नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे टेक हब्स को भविष्य के जोखिम से बचाने के लिए सिंगापुर और पैसिफिक रूट के जरिए बैकअप कनेक्टिविटी मजबूत करनी होगी।
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