होम दिल्ली बॉर्डर पर अब नहीं लगेगा जाम, टोल बूथ हटाने की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण पर आया नया प्लान
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की मार झेल रहे लोगों के लिए एक बड़ी राहत की खबर आ सकती है। आने वाले समय में दिल्ली की सीमाओं पर टोल चुकाने के लिए गाड़ियों की लंबी कतारों से मुक्ति मिल सकती है।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की मार झेल रहे लोगों के लिए एक बड़ी राहत की खबर आ सकती है। आने वाले समय में दिल्ली की सीमाओं पर टोल चुकाने के लिए गाड़ियों की लंबी कतारों से मुक्ति मिल सकती है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण से निपटने के लिए एक विस्तृत रोडमैप पेश किया है। इसमें सबसे क्रांतिकारी सुझाव एमसीडी (MCD) के टोल कलेक्शन बूथों को लेकर है। आयोग ने प्रस्ताव दिया है कि सीमाओं पर टोल वसूली के लिए गाड़ियों को रोकने की पुरानी व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए और इसकी जगह हाई-टेक सिस्टम लागू हो।
CAQM ने सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने सुझाव में कहा है कि दिल्ली की सीमाओं पर एमसीडी टोल कलेक्शन के लिए वाहनों को कतार में खड़ा करना ट्रैफिक और प्रदूषण, दोनों के लिए घातक है। आयोग ने सुझाव दिया है कि मैनुअल वसूली की जगह 'रेडियो फ्रीक्वेंसी टैग' (RFID) और कैमरा आधारित ऑटोमैटिक सिस्टम को पूरी तरह अपनाया जाए। इससे गाड़ियां बिना रुके गुजर सकेंगी, जिससे बॉर्डर पर लगने वाला जाम खत्म होगा और गाड़ियों के धुएं से होने वाला प्रदूषण भी कम होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा था कि हर साल सर्दियों में दम घोंटू हवा के लिए सिर्फ पराली जलाने वाले किसानों को दोष देना गलत है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद CAQM ने जो चार्ट पेश किया, उसने असलियत सामने रख दी। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार गाड़ियों से निकलने वाला धुआं है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पराली और अवशेष जलाने से सर्दियों में लगभग 20 प्रतिशत प्रदूषण होता है, जबकि गर्मियों में यह घटकर 12 प्रतिशत रह जाता है। वहीं, गर्मियों में धूल प्रदूषण का कारण 27 प्रतिशत तक होता है।
आयोग ने कोर्ट में कई दूरगामी उपाय सुझाए हैं, जो आने वाले दिनों में दिल्ली की तस्वीर बदल सकते हैं:
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने CAQM के इन उपायों को रिकॉर्ड पर ले लिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि पहले सभी संबंधित पक्ष इन प्रस्तावों पर आपस में चर्चा करें और फिर अदालत को बताएं कि इन्हें जमीनी स्तर पर कब तक और किस हद तक लागू किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद का समय तय किया है।
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