होम नोटबंदी के समर्थन में कई जिनकी किताब का हवाला देते हैं वे खुद इसे लेकर क्या सोचते हैं?
नोटबंदी के समर्थन में कई जिनकी किताब का हवाला देते हैं वे खुद इसे लेकर क्या सोचते हैं?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके और इन दिनों हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे प्रोफेसर केन रोगॉफ को अर्थनीति के सबसे बड़े विचारकों में गिना जाता है. उनकी किताब 'द कर्स ऑफ कैश' (नकदी का शाप) के प्रकाशित होने के कुछ ही समय बाद मोदी सरकार ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया था. इसका समर्थन करने वाले कई लोगों ने 'द कर्स ऑफ कैश' का भी हवाला दिया. केन रोगॉफ ने इसके बाद अपनी किताब में भारत को लेकर कुछ और अंश जोड़े. आइए जानते हैं इनमें उनकी नोटबंदी को लेकर क्या राय थी.
आठ नवंबर, 2016. अमेरिकी जनता डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद पर चुन रही थी. उसी दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय चैनलों पर आए और एक चौंकाने वाली घोषणा कर दी : आज मध्य रात्रि से भारत के दो सबसे अधिक मूल्य - 500 और 1000 रुपये के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, यानी अमान्य हो जाएंगे; आपके पास 50 दिन का समय है, इतने में आप पुराने नोटों को बैंकों में जमा कर सकते हैं या इनके बदले नए नोट ले सकते हैं.
उस वक्त भारत में कुल लेन-देन का तकरीबन 90 फीसदी हिस्सा नकदी में ही चल रहा था और इस नकदी का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा 500 और 1000 के नोटों में था. तेज गति से आगे बढ़ रहे 1.30 अरब लोगों के इस देश में मोदी की यह नोटबंदी बेहद नाटकीय और ऐसी आर्थिक घटना थी जिसका दूर-दूर तक असर पहुंचा.
इस नाटकीयता को और बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की जानकारी देने से पहले अपनी कैबिनेट के सभी सदस्यों के फोन जमा करवा लिए थे. इस कदम का मकसद जनता को आश्वस्त करना था कि मंत्रियों के पास भी इस फैसले के जरिए कोई फायदा उठाने का मौका नहीं था.
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