होम अगर अमेरिका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव न होता तो उसकी हालत इतनी बुरी नहीं होती
अगर अमेरिका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव न होता तो उसकी हालत इतनी बुरी नहीं होती
दुनिया के 190 से ज्यादा देश इस समय कोरोना वायरस संकट से जूझ रहे हैं. इन देशों में सबसे खराब हालत दुनिया के सबसे विकसित और ताकतवर देश अमेरिका की है. 18 मई के आंकड़ों को देखें तो यहां संक्रमितों की कुल संख्या 15 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है, जबकि 90 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. अमेरिका की इस हालत के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. कहा जा रहा है कि उनके समय रहते फैसले न लेने के चलते अमेरिका की यह हालत हुई है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य अधिकारियों से लेकर तमाम खुफिया एजेंसियों ने जनवरी से ही राष्ट्रपति प्रशासन को कोरोना वायरस की चेतावनी देना शुरू कर दिया था, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप इन्हें नजरअंदाज करते रहे और इस महामारी से निपटने की कोई तैयारी उन्होंने नहीं की.
जर्मनी सहित कई देशों ने जनवरी से ही कोरोना वायरस की टेस्ट किट्स बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी. लेकिन अमेरिका ने इस और भी कोई ध्यान नहीं दिया. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी और डब्ल्यूएचओ ने जनवरी में ही अमेरिका को टेस्टिंग किट्स देने की पेशकश की थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया. इसके बाद फरवरी में जब कोरोना के मामले बढ़ने शुरू हो गये, तब भी ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग करने को लेकर डोनाल्ड ट्रंप गंभीर नहीं थे. 28 फरवरी को जब प्राइवेट लैब्स द्वारा अमेरिकी कांग्रेस को एक पत्र लिखा गया तब कहीं जाकर अगले दिन सरकार ने उन्हें भी कोरोना वायरस की टेस्टिंग किट बनाने और टेस्ट करने की अनुमति दी. 'सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट' में वैश्विक महामारी के विशेषज्ञ जेरेमी कोनडायक सीएनएन से बातचीत में कहते हैं, 'शुरुआती दिनों में केवल सरकारी एजेंसी-सीडीए पर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की निर्भरता के चलते टेस्टिंग में देरी हुई और इससे अमेरिका में कोविड-19 फैल गया.'
अमेरिका के कुछ राजनीतिक विश्लेषक डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कोरोना वायरस से जुड़ी तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज करने और इस मामले में कोताही बरतने के पीछे जो सबसे बड़ी वजह मानते हैं वह है इस साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव. दुनिया के जाने-माने समाजशास्त्री और लेखक नोम चॉम्स्की 'द गार्डियन' को दिए एक साक्षात्कार में सीधे-सीधे कहते हैं, 'अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हजारों अमेरिकी लोगों की मौत के दोषी हैं. उन्होंने चुनावी फायदा उठाने और कारोबारियों की जेबें भरने की खातिर उनकी जान दांव पर लगा दी.'
आइये जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने किस तरह अपनी चुनावी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की वजह से वक्त रहते कोरोना वायरस से निपटने की ओर ध्यान नहीं दिया. और कैसे वे आज भी चुनावी बिसात बिछाने में ही लगे हुए हैं.
चुनाव प्रचार के पटरी से उतरने का डर
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कोरोना वायरस से निपटने के लिए सही समय पर कोई बड़ा फैसला न लेने के पीछे चुनाव से जुड़ी कई वजहें नजर आती हैं. जानकारों के मुताबिक ट्रंप को सबसे पहले तो यह डर सता रहा था कि अगर उन्होंने लॉकडाउन जैसा कोई बड़ा फैसला लिया तो उनका चुनाव प्रचार पटरी से उतर जाएगा. जनवरी और फरवरी में जिस समय सीआईए उन्हें कोरोना वायरस की चेतावनी दे रही थी, उस दौरान उन्होंने दस रैलियां कीं. फरवरी के अंत में वे भारत की दो दिवसीय यात्रा पर भी आये और गुजरात के अहमदाबाद में एक रैली को संबोधित किया. इसका मकसद भी नरेंद्र मोदी के जरिये भारतीय मूल के अमेरिकी वोटरों को साधना ही था. मार्च में जब कोरोना वायरस अमेरिका में बड़ी तेजी से पैर पसार रहा था, तब भी ट्रंप ने इसके शुरुआती हफ्ते में दो रैलियां की. कोरोना वायरस जैसी महामारी के दौरान भी डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनाव प्रचार कितना जरूरी था, इसका पता उनके एक बयान से ही लग जाता है. सात मार्च को एक प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि भले ही कोरोना के चलते भीड़ न जुटाने की सलाह दी गयी है, लेकिन अभी अपनी रैलियां रोकने की उनकी कोई योजना नहीं है. जाहिर है कि अगर ट्रंप फरवरी में ही लॉकडाउन जैसा बड़ा फैसला ले लेते तो वे चुनावी रैलियां नहीं कर पाते.
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