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कब बनेगी कोरोना की दवा, जानिए अब इजराइल की तरफ क्यों देख रही है दुनिया
कोरोना वैक्सीन दुनिया का कोई भी देश या लैब बनाए, उसे आते-आते काफी वक्त लग जाएगा. ऐसे में कोरोना से निपटने के लिए इजराइल की कोशिश यकीनन उम्मीद की किरण साबित हो सकती है. लिहाजा अब पूरी दुनिया बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से इजराइल की तरफ देख रही है. हालांकि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी को कोरोना का इलाज मान भी लें. तो भी अभी इसे कई पैमानों से होकर गुजरना है और इन तमाम चीजों में कुछ महीने का वक्त और लगेगा.
इजराइल के दावे के मुताबिक अगर कोरोना वायरस को खत्म करने वाला एंटीबॉडी का टेस्ट कामयाब भी हो जाता तो भी उसे वैक्सीन के रूप में आने में अभी वक्त लगेगा. क्योंकि इंसानों को लगाने से पहले इस वैक्सीन के लिए जो-जो जरूरी प्रक्रियाएं हैं. उन्हें तो इजराइल इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल रिसर्च यानी IIBR को पूरा करना ही पड़ेगा.
कोई भी टीका पहले जानवरों पर आजमाया जाता है फिर उसका क्लीनिकल ट्रायल शुरू होता है. परीक्षण के दौरान ये ख्याल रखना पड़ता है कि वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं. टीका वही सफल माना जाता है, जिससे 60 से 70 फीसदी बीमारी ठीक हो सके. टीके का क्या साइड इफेक्ट है. बिना इसके अध्ययन के टेस्ट कामयाब नहीं माना जाता है. किसी टीके का क्लीनिकल ट्रायल उसके विकास का सबसे जरूरी पड़ाव है. किसी भी टीके का क्लीनिकल परीक्षण हर आयु के लोगों पर किया जाता है. सौ फीसदी सफल होने के बाद ही किसी टीके का औद्योगिक उत्पादन शुरू होता है.
इस पूरी प्रकिया में कई महीनों का वक्त लग सकता है. कोरोना की गंभीरता को देखते हुए अगर सरकारी कार्रवाई में तेजी भी लाई जाए तो क्लीनिकल ट्रायल के लिए जो जरूरी वक्त है वो तो देना ही पड़ेगा. यानी तब भी कुछ महीने लग जाएंगे. और वैक्सीन के इजाद के बाद सबसे बड़ी चुनौती है इसका औद्योगिक उत्पादन क्योंकि इसके बनने के बाद पूरी दुनिया को ये वैक्सीन चाहिए होगी. जिसके लिए बहुत ज्यादा फंड की भी जरूरत पड़ेगी. हालांकि अच्छी बात ये है कि दुनिया इस दिशा में सोच रही है. यूरोपीय संघ के मुताबिक विश्व के नेताओं ने कोरोना से लड़ने के लिए 8 अरब डॉलर की राशि जुटाने का वादा किया है. हालांकि अमेरिका ने इस मुहिम में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
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