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समाचारदेश Alert Star Digital Team May 8, 2020 04:15 PM

कोरोना वायरस क्या वाक़ई जून-जुलाई में भारत में तबाही मचाने वाला है

कोरोना वायरस क्या वाक़ई जून-जुलाई में भारत में तबाही मचाने वाला है

कोरोना वायरस क्या वाक़ई जून-जुलाई में भारत में तबाही मचाने वाला है

गुरुवार को एम्स डायरेक्टर के हवाले से देश के तमाम मीडिया चैनल में एक बयान चल रहा था.

जून-जुलाई में अपने चरम पर होगा कोरोना- डॉ. रणदीप गुलेरिया

लेकिन ये पीक क्या है- इसका मतलब कहीं नहीं समझाया जा रहा. उस पीक में रोज़ कितने मामले सामने आएंगे, इसकी कोई बात नहीं हो रही.

हर कोई इस बयान को अपने हिसाब से समझ रहा है. कोई कह रहा है अब लॉकडाउन आगे भी बाया जाएदा, अब तो दुकानें फिर से बंद करनी पड़ेंगी...वगैरह वगैरह...

शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कोरोना का पीक आने वाला है. जब उनसे इससे जुड़ा एक सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, "मैं एक्सपर्ट नहीं हूँ.

दरअसल रणदीप गुलेरिया से सवाल पूछा गया- क्या भारत में कोरोना का पीक आना बाकी है.

रणदीप गुलेरिया का जवाब था, "अभी तो केस बढ़ रहे हैं. पीक तो आएगा ही. पीक कब आएगा, ये मॉडलिंग डेटा पर आधारित होता है. कई एक्सपर्ट ने इसकी डेटा मॉडलिंग की है. इंडियन एक्सपर्ट ने भी की है और विदेशी एक्सपर्ट ने भी की है. ज़्यादातर लोगों का मानना है कि जून-जुलाई में पीक आ सकता है. कुछ एक्सपर्ट ने इससे पहले भी पीक आने की बात कही है. कुछ एक्सपर्ट ने कहा है कि इसके आगे अगस्त तक भी पीक आ सकता है"

इसके आगे रणदीप गुलेरिया ने कहा, "मॉडलिंग डेटा कई वेरिएबल्स (फैक्टर) पर निर्भर करता है. पहले के मॉडलिंग डेटा में अगर आप देखें तो ये कहा गया था कि कोरोना पीक मई में आएगा. उस मॉडलिंग डेटा में ये फैक्टर शामिल नहीं किया गया था कि लॉकडाउन आगे बढ़ेगा. उसको फैक्टर इन किया गया तो पीक का टाइम आगे बढ़ गया है. ये एक डायनमिक प्रोसेस है यानी निरंतर बदलते रहने वाली प्रक्रिया है. हो सकता है हफ्ते भर बाद की स्थिति को देख कर मॉडलिंग डेटा देने वाले अपना पूर्वानुमान बदल दें."

दरअसल, डॉ. रणदीप गुलेरिया का पूरा बयान सुनने पर ये साफ़ हो जाता है कि उनके बयान का आधार मैथेमेटिकल डेटा मॉडलिंग है.

लेकिन वो कौन-सी डेटा मॉडलिंग है, कहां के एक्सपर्ट ने की है? क्या ये उनके ख़ुद की है? इसके बारे में ना तो उनसे सवाल पूछे गए और ना ही उन्होंने इसका जवाब दिया.

हां, एक जगह डॉ. गुलेरिया ने ज़रूर कहा कि कई बार ज़मीनी परिस्थितियां देख कर इस तरह के पूर्वानुमान बदल भी जाते हैं.

डॉ. रणदीप गुलेरिया से यही सवाल करने के लिए बीबीसी कल शाम से ही उनसे सम्पर्क करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन इस स्टोरी के लिखे जाने तक उनका जवाब नहीं मिल पाया है.

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