होम तो क्या मौसम पर पड़ रहा लॉकडाउन का उल्टा असर!
तो क्या मौसम पर पड़ रहा लॉकडाउन का उल्टा असर!
कोरोना वायरस के संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए इस समय पूरे देश में 3 मई तक के लिए लॉकडाउन लागू है। अगर दुनियाभर के आंकड़ों को देखें तो भारत ने लॉकडाउन के जरिए कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में फिलहाल काफी हद तक सफलता पाई है। वहीं, लॉकडाउन के चलते देश में पर्यावरण के स्तर पर एक बड़ा सुधार देखने को मिला है। हवा-पानी से लेकर जंगली जानवरों में भी पर्यावरण के इस बदलाव की झलक मिल रही है। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि लॉकडाउन के चलते पर्यावरण में जो सुधार देखने को मिल रहा है, असल तस्वीर उससे पूरी तरह अलग है। इसे लेकर एक्सपर्ट्स ने कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी दिए हैं।CO2 को घटाने में लॉकडाउन का कितना असर
'द वेदर चैनल' में छपी श्रीधर बालसुब्रमण्यन की रिपोर्ट के मुताबिक, वाहनों और फैक्ट्रियों के बंद होने से कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, इसलिए इस समय तापमान, बादलों के पैटर्न और बारिश सहित आंधी तूफान पर इस कमी के प्रभाव को समझना बहुत जरूरी है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर यह मान भी लें कि 24 मार्च 2020 यानी लॉकडाउन के लागू होने के बाद से पूरे देश में कार्बन डाईऑक्साइड का कहीं कोई उत्सर्जन नहीं हुआ है, तो भी इसका कोई विशेष असर पर्यावरण पर पड़ता हुआ नजर नहीं आ रहा है। दरअसल, क्रूड ऑयल के आंकलन के मुताबिक, भारत का कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन, एक महीने में कुल वैश्विक उत्सर्जन का 0.04 पार्ट्स/मिलियन यानी पीपीएम के बराबर है। अब अगर इसकी तुलना पहले से मौजदू पूरी दुनिया के कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन, जोकि 414 पीपीएम है, से करें तो पता चलता है कि CO2 को घटाने में लॉकडाउन का शायद ही कोई विशेष असर पड़े।वायुमंडल में काफी अहम है जल वाष्प की मौजूदगी
गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का स्तर लगातार बढ़ रहा है और मौजूदा साल यानी 2020 में भी इस कार्बन डाइऑक्साइ की मात्रा काफी ऊंचे स्तर पर है। दूसरी तरह महासागरों के वाष्पीकरण (पानी का भाप बनकर उड़ना) के कारण वायुमंडल में जल वाष्प भी बड़ी मात्रा में मौजूद है। हालांकि जल वाष्प की उम्र काफी कम होती है, क्योंकि ये जल्दी ही बादलों और उसके बाद पानी की ठोस बूंदों में बदल जाता है। इसके बावजदू यह एक बेहद अहम ग्रीन हाउस गैस है, क्योंकि इसकी वजह से मौसम में गर्मी बढ़ती है।
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