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NU में आंदोलन चल रहा है कि ख़त्म हो गया है?
पिछले साल नवंबर में सोशल मीडिया पर जेएनयू के ख़िलाफ़ कैंपेन में इलाहाबाद के 30 साल के पंकज मिश्र को 47 साल का केरल का मोइनुद्दीन बताया गया था.
पंकज जेएनयू में सोशल मेडिसीन और कम्युनिटी हेल्थ से एमफ़िल कर रहे हैं. वो जेएनयू में फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन में भी मुखर थे.
एंटी जेएनयू अभियान में पंकज के बारे में यह भी कहा गया था कि सस्ता खाना और हॉस्टल के कारण 1989 से जेएनयू में पढ़ रहे हैं. इन्हीं अफ़वाहों के आधार पर एक टीवी डिबेट में उनकी तस्वीर बार-बार दिखाकर उन्हें प्रौढ़ कहा गया था.
पंकज कहते हैं कि उनके सिर पर बाल न के बराबर हैं इसलिए उन्हें प्रौढ़ कहा गया.
जेएनयू में चार जनवरी को हुई हिंसा की जाँच के लिए एक एसआइटी का गठन किया गया है.
दिल्ली पुलिस ने कुल नौ लोगों को नामज़द किया है. इन सभी नौ लोगों से पूछताछ हो गई है.
इन नौ लोगों में दो एबीवीपी के, लेफ्ट पार्टियों के स्टूडेंट विंग के छह और एक पंकज मिश्र भी हैं.
पंकज मिश्रा
पंकज मिश्र के बारे में भी टीवी रिपोर्ट में वामपंथी पार्टियों के छात्र विंग का नेता बताया गया लेकिन वो किसी भी छात्र संगठन से जुड़े नहीं हैं. पंकज से भी पूछताछ हुई है. उनसे लिखित बयान लिया गया है और जांच अधिकारियों ने कुछ वीडियो फुटेज दिखाकर लोगों की पहचान के बारे में पूछा.
जिन लोगों से पूछताछ की गई है उनमें से एबीवीपी के विकास पटेल (जेएनयू के पूर्व छात्र) और योगेंद्र भारद्वाज (संस्कृत के छात्र) हैं.
लेफ्ट पार्टियों के स्टूडेंट विंग के जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष, डोलन, सुचेता, चुनचुन, प्रियरंजन और भास्कर विजय हैं. एबीवीपी वाले बताते हैं कि पंकज भी वामपंथी पार्टियों से ही जुड़े हैं.
एबीवीपी के विकास पटेल से कुछ दक्षिणपंथी वॉट्सऐप ग्रुप में हिंसक मैसेज भेजने और हिंसा के दौरान डंडा लेकर खड़े रहने के बारे में पूछताछ की गई है.
जब विकास पटेल से पूछा गया कि क्या उन्होंने मैसेजेज़ किए थे तो वो मुस्कुराते रहे. हालांकि पुलिस ने विकास का मोबाइल भी ज़ब्त नहीं किया है.
वामपंथी नेतृव वाले जेएनयूएसयू ने फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ रजिस्ट्रेशन का बहिष्कार किया था लेकिन यह बहिष्कार अब लगभग नाकाम हो चुका है.
जेएनयू प्रशासन का कहना है कि अगले सेमेस्टर के लिए 95 फ़ीसदी छात्रों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है.
स्कूल फॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ सेंटर के डीन प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा ने बताया कि लोगों ने लेट फीस तक देकर रजिस्ट्रेशन कराया है.
लेट फ़ीस देकर रजिस्ट्रेशन कराने वालों में पंकज मिश्र भी हैं जो कल तक रजिस्ट्रेशन के बहिष्कार के साथ थे.
वो बताते हैं, "जेएनयूएसयू ने छात्रों को कन्फ़्यूज करके रख दिया. इन्होंने 11 जनवरी को रजिस्ट्रेशन बहिष्कार वापस ले लिया और कह दिया कि रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं. ऐसे में जो इनके साथ खड़े थे वो भी जाकर रजिस्ट्रेशन करवाने लगे."
पंकज कहते हैं, "यह लड़ाई छात्रों के हित की थी लेकिन अब हाथ से निकल चुकी है. अब नहीं लगता है कि उस तरह से कोई आंदोलन खड़ा हो पाएगा."
जेएनयूएसयू के सचिव सतीश चंद्र यादव भी इस बात को मानते हैं कि प्रशासन ने उन्हें कन्फ्यूज़न में रखा.
वो कहते हैं, "पहले प्रशासन ने आश्वासन दिया कि फ़ीस नहीं बढ़ाई जाएगी. एचआरडी मंत्रालय से भी कुछ ऐसा ही कहा गया. इसी आधार पर रजिस्ट्रेशन के बहिष्कार को वापस लेने और नहीं लेने का कन्फ़्यूजन बढ़ा."
सतीश को भी लगता है कि फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ पहले की तरह लोगों को लामबंद करना अब आसान नहीं होगा.
क्या वाक़ई फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ जेएनयू के आंदोलन का अंत हो गया है?
जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर डीके लोबियाल कहते हैं, "यह आंदोलन इतने लंबे समय से चल रहा था लेकिन सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन सुनने के तौयार नहीं थे. छात्र नारे लगा सकते हैं, बहिष्कार कर सकते हैं, अनशन कर सकते हैं और सब कुछ किया भी. लेकिन कोई नहीं सुनेगा तो क्या होगा?"
"आख़िर उपाय बचता है कि क़ानून तोड़ो. पाँच जनवरी को कैंपस के भीतर बाहर से गुंडे बुलाकर इस आंदोलन को और कमज़ोर कर दिया गया. सरकार सीएए पर नहीं सुन रही है तो जनता क्या करेगी? अगर सीएए वापस नहीं होता है तो हम जनता को दोष नहीं दे सकते."
2017 में छात्राओं के आंदोलन के बाद बीएचयू के वीसी को हटना पड़ा, एफटीआईआई को लेकर भी सरकार अड़ी रही लेकिन वहां से भी गजेंद्र चौहान को हटाना पड़ा, मणिपुर यूनिवर्सिटी में वीसी के ख़िलाफ़ छह महीने तक आंदोलन चला और वहां के वीसी को भी हटाना पड़ा लेकिन जेएनयू को लेकर सरकार क्यों अड़ी है?
प्रोफ़ेसर लोबियाल कहते हैं, "इसी से समझ सकते हैं कि इनके मन में जेएनयू किसी कांटे की तरह चुभता है. यहां तक कि उनके बुज़ुर्ग नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी कहा कि वीसी को हटाओ. लेकिन उनकी भी सरकार ने नहीं सुनी. जेएनयू को ये ख़त्म करना चाहते हैं और धीरे-धीरे कामयाब हो रहे हैं. संभव है कि आने वाले दिनों में यहां से स्टूडेंट यूनियन ही ख़त्म कर दें."
होस्टल मैनुअल और फ़ीस बढ़ोतरी पर आंदोलन के सामने यूनिवर्सिटी प्रशासन नहीं झुका लेकिन पूरी उम्मीद दिल्ली हाई कोर्ट पर टिकी है. इस मामले में शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई है.
कितनी बढ़ी है फ़ीस?
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