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समाचारराजनीति Alert Star Digital Team Jan 21, 2020 12:17 PM

इराक़ के सुन्नियों का रुख़ अमरीका को लेकर क्यों पलट गया

इराक़ के सुन्नियों का रुख़ अमरीका को लेकर क्यों पलट गया

इराक़ के सुन्नियों का रुख़ अमरीका को लेकर क्यों पलट गया

साल 2003 के दिसंबर महीने में अमरीका ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदख़ल किया तो वहां के शिया मुसलमानों ने जश्न मनाया था. शियाओं को लगा था कि अमरीका ने सद्दाम हुसैन को हटाकर उनकी मनोकामना पूरी कर दी.

इराक़ के वर्तमान प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी तब शक्तिशाली शिया पार्टी के नेता थे. सद्दाम के अपदस्थ होने के बाद वो एसयूवी गाड़ी पर सवार होकर एक जुलूस में निकले थे. हर तरफ़ से वो बॉडीगार्ड से घिरे थे और जीत का जश्न मना रहे थे.

इसी जश्न में उन्होंने लंदन के पत्रकार एंड्र्यू कॉकबर्न से कहा था, ''सब कुछ बदल रहा है. लंबे समय से शिया समुदाय के लोग इराक़ में बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यकों की तरह रह रहे थे. अब शियाओं के हाथ में इराक़ की कमान आएगी.''

2003 के बाद से अब तक इराक़ के सारे प्रधानमंत्री शिया मुसलमान ही बने और सुन्नी हाशिए पर होते गए. 2003 से पहले सद्दाम हुसैन के इराक़ में सुन्नियों का ही वर्चस्व रहा. सेना से लेकर सरकार तक में सुन्नी मुसलमानों का बोलबाला था.

कैसे पलट गई बाज़ी?

सद्दाम के दौर में शिया और कुर्द हाशिए पर थे. इराक़ में शिया 51 फ़ीसदी हैं और सुन्नी 42 फ़ीसदी लेकिन सद्दाम हुसैन के कारण शिया बहुसंख्यक होने के बावजूद बेबस थे. जब अमरीका ने मार्च 2003 में इराक़ पर हमला किया तो सुन्नी अमरीका के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे और शिया अमरीका के साथ थे.

17 साल बाद अब समीकरण फिर से उलटता दिख रहा है. इसी महीने इराक़ की संसद में एक प्रस्ताव पास किया गया कि अमरीका अपने सैनिकों को वापस बुलाए. इस प्रस्ताव का इराक़ के प्रधानमंत्री अब्दुल महदी ने भी समर्थन किया. सबसे दिलचस्प ये रहा कि संसद में इस प्रस्ताव का सुन्नी और कुर्द सांसदों ने बहिष्कार किया और शिया सांसदों ने समर्थन किया.

संसद में बहस के दौरान सुन्नी स्पीकर ने शिया सांसदों से कहा था कि वो इराक़ के भीतर फिर से हिंसा और टकराव को लेकर सतर्क रहें. मोहम्मद अल-हलबूसी ने कहा था, ''अगर कोई ऐसा क़दम उठाया गया तो इराक़ के साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय वित्तीय लेन-देन बंद कर देगा. ऐसे में हम अपने लोगों की ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पाएंगे.''

हालांकि ये सवाल भी उठ रहे हैं कि इराक़ की वर्तमान सरकार के पास वो अधिकार नहीं है कि अमरीकी सैनिकों को वापस जाने पर मजबूर करे. अब्दुल महदी केयरटेकर प्रधानमंत्री हैं.

लेकिन एक बात स्पष्ट है कि सुन्नी चाहते हैं कि अमरीकी सैनिक इराक़ में रहें और शिया चाहते हैं कि अमरीका अपने सैनिकों को वापस बुलाए. 2003 में सुन्नी इराक़ में अमरीका के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे और अब इन्हें लग रहा है कि अमरीका यहां से गया तो वो सुरक्षित नहीं रहेंगे.

दूसरी तरफ़, जिस अमरीका ने सद्दाम हुसैन को हटाया वही अमरीका अब इराक़ में शिया मुसलमानों को ठीक नहीं लग रहा. तो क्या अमरीका के प्रति इराक़ के भीतर सुन्नी मुसलमानों के मन में सहानुभूति पैदा हो रही है और अमरीका भी अब सुन्नियों का साथ देगा? दूसरा सवाल यह कि इराक़ के भीतर पूरा समीकरण कैसे उलट गया?

इराक़ के सुन्नी अमरीका को क्यों चाहने लगे?

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''इराक़ के भीतर समीकरण वाक़ई बदल गया है. सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद अमरीका ने सुन्नी मुसलमानों से वादा किया था कि उन्हें इराक़ की सेना में शामिल किया जाएगा लेकिन अमरीका ने ये वादा निभाया नहीं. सद्दाम के बाद इराक़ की सरकार और सेना में शिया मुसलमानों का दबदबा बढ़ गया. अगर सुन्नियों को भी रखा जाता तो संतुलन रहता. इस संतुलन के नहीं होने की वजह से शिया बहुल देश ईरान का प्रभाव इराक़ की सरकार और सेना में बढ़ा और यह अमरीका के हक़ में नहीं रहा.''

प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''जो हालत सद्दाम के इराक़ में शिया मुसलमानों की थी अब वैसी ही शिया दबदबे वाली इराक़ी सरकार में सुन्नियों की हो गई है. इराक़ की सरकार और सेना में शियाओं का नियंत्रण है. उत्तरी इराक़ में कुर्दों का अपना स्वायत्त इलाक़ा है जबकि सुन्नी राजनीतिक रूप से बिल्कुल अनाथ हो गए हैं.''

इराक़ के भीतर सुन्नियों को लगता है कि अगर अमरीकी सेना वापस चली गई तो उनके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी. ब्रिटिश अख़बार टेलिग्राफ़ यूके से सद्दाम की ख़ुफ़िया सर्विस में काम कर चुके 55 साल के महमूद ओबैदी ने कहा है, ''अगर अमरीकी सेना वापस जाती है तो इराक़ में सुन्नियों के लिए यह डरावना होगा. अमरीका अतीत में हमारा दुश्मन रहा है लेकिन ईरान की तुलना में वो ठीक है. अगर अमरीका गया तो हम ईरानियों के सस्ते शिकार साबित होंगे. हमलोग अमरीका के कोई प्रशंसक नहीं हैं लेकिन जब तक यहां ईरान हमें अकेला नहीं छोड़ देता है तब तक अमरीका को नहीं जाना चाहिए.''

इराक़ के प्रधानमंत्री अब्दुल महदी ने संसद में अमरीकी सेना को वापस भेजने के प्रस्ताव का समर्थन किया है.

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