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महिला जगत के लिए पैगाम-ए-गज़़ल
लोक सेतिया 'तनहा':- 'ऐग़मे दिल क्या करूं, ऐ बहशते दिल क्या करूं। Ó ये नज़्म आपने सुनी होगी, कभी नहीं भुला सकते। मगर क्या याद है वो तरक्कीपसंद शायर जिसने करीब साठ साल पहले औरतों को आंचल को परचम बनाने का पैगाम दिया था। लखनऊ के निशातगंज कब्रिस्तान में शायद ही अब कोई जाता होगा, फूल चढ़ाने या दिया जलाने। मगर मजाज़ की कब्र के सिरहाने लगे पत्थर पर अब भी ये इबारत लिखी हुई होगी- 'अब इसके बाद सुबह है और सुबह नौ मजाज़ , हम पर है खत्म शामे गरेबां लखनऊ।Ó समझ नहीं आता मुझे आज यहां जो लिखना है, उसकी शुरआत कहां से करूं और फिर कैसे उन सभी बातों को उसमें शामिल करूं जो किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं! दो बातें हैं ज़हन में, बेटी बचाओ आंदोलन का इधर सरकारी शोर बहुत है, कहीं अख़बार सोशल मीडिया भरे पड़े हैं बेटी के साथ सेल्फ़ी से तो कहीं प्रशासन या कोई गैर सरकारी संगठन कोई कार्यक्रम कोई बैठक आयोजित कर रहा है! मुझे दो सवाल परेशान करते हैं, पहला क्या ये जो लोग सेल्फ़ी लेते दिखाई दे रहे वो कल अपनी बेटी को सम्पति में बेटों के बराबर हिस्सा देंगे! मुझे नहीं लगता ऐसा होगा, महिला अधिकारों की बातें करने वाले भी नहीं चाहते कोई बेटी पिता की सम्पति पर अपना हक कभी मांगे! वो कहते हैं शादी के बाद उसको पति की जायदाद से तो मिलता है हर प्रकार से फायदा, मगर ये इक छल है धोखा है, उसको पति की सम्पति पर अधिकार नहीं मिलता, भले उस से जो आय होती है, वो परिवार पर खर्च की जाती है जिसमें वो भी शामिल है! मगर उसको अपनी मजऱ्ी से बेचने या उपयोग करने का हक किसी पत्नी को कभी नहीं मिलता! अगर मिलता भी है तो पति की मौत के बाद वो भी केवल तब तक रखवाली करने को जब तक बेटे उसको अपने नाम नहीं करवा लेते! और ये बेटे अपनी मां से भले जितना भी प्यार जतलाते हों, ये ऐतबार नहीं रखते कि मां खुद उनको ही तो देगी वसीयत में! कहीं बेटी को न दे दे, या कहीं हमसे किसी बात से नाराज़ हो खुद अपने पर ही न खर्च कर ले किसी ज़रूरत में, मज़बूरी में! खेद की बात ये है कि ये मायें भी चाहती हैं जीते जी जो भी अपना उसको बेटों के नाम कर देना, इक डर उनको लगता है, कहीं बेटियां अपना अधिकार नहीं मांग लें भाईयों से। उनको लगता है जो बेटी हिस्सा लेती है वो भाई-बहन के प्यार को उसके रिश्ते को खो देती है। ये अजीब तर्क सदा से भरा जाता रहा है महिलाओं के दिमाग में। हर रिश्ते को निभाने को औरत ही कुर्बानी दे, कब तक यही होता रहेगा, ये औरत को त्याग का सबक पढ़ाने वाले क्यों अपना स्वार्थ नहीं त्याग सकते ताकि उनकी बेटी ,उनकी बहन स्वाभिमान पूर्वक जी सके। आत्मनिर्भर होकर समाज में ये कह सके इसकी मालिक मैं हूं , ये मेरे पिता या पति की सम्पति नहीं, मेरी अपनी है। क्या किसी नेता, किसी धर्मगुरु ने कभी ये कहने का साहस किया है, कि अपनी बेटी को बराबर सम्पति देना भी ज़रूरी है, जब वो बेटी बचाओ या दहेज विरोधी चर्चा में भाषण देते हैं। नहीं कहते कभी भी, क्योंकि उनको अपना वोटबैंक अपने अनुयाई प्यारे हैं , क्या महिलाएं वोट नहीं देती, क्या वो उनकी अनुयाई नहीं हैं, मगर यहां भी उनका दर्जा बराबरी का नहीं है। कितना आडंबर करते हैं ये लोग, जो बोलते वो सच में चाहते नहीं हैं। मुझे नहीं लगता इस सेल्फ़ी वाले प्रयोग से कुछ भी हासिल होगा। अब बात प्रशासन की सभाओं की, जो और भी उपहास होता है, उनको कुछ भी करना नहीं होता, केवल औपचारिकता भर निभानी होती है। वहां ऐसे लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जो हर दिन पैसे के लिए अपना ईमान बेचते हैं, देश-हित, जन-हित क्या उनको क्या। वो उनको समझाते हैं जो पैसे के लालच में लिंग जांच या भ्रूण हत्या करते हैं। इक और बात सोचने की है, क्या कन्या भ्रूण हत्या ही हत्या है या कोई भीसा भू्रण हो उसकी हत्या, हत्या है। ये कानून कैसा है जो इकतरफा लगता है। बेशक ये सच है कि भू्रण अगर बालक का अर्थात पुत्र होने का होगा तो कोई नहीं चाहेगा उसको कोख में दफ्ऩ करना, फिर भी क्यों न इस भू्रण हत्या पर ही रोक लगा दी जाए, रही बात आबादी को बढऩे से रोकने की तो उसके लिए और उपाय भी हैं, और एबॉर्शन होने के बावजूद भी आबादी कहां रुकी है। ये सब तमाशे आज तक क्या महिलाओं की हालत को बदल सके, मगर ऐसा भी नहीं है कि ये बदलाव मुमकिन नहीं है। कैसे, चलो पढ़ते हैं मजाज़ जी की ये लोकप्रिय गज़़ल- हिजाबे फि़तना परवर अब हटा लेती तो अच्छा था , खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था। तेरी नीची नजऱ खुद तेरी अस्मत की मुहाफिज़़ है , तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था। तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत , तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था। दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल , तू आंसू पौंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था। तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है , अगर तू साज़े बेदारी उठा लेती तो अच्छा था। (साज़े - बेदारी = बदलाव का औज़ार) तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन , तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था।
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