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विचारकला-साहित्य Alert Star Digital Team Sep 1, 2015 11:48 AM

स्वतंत्रता का सांस्कृतिक विमर्श

स्वतंत्रता का सांस्कृतिक विमर्श

स्वतंत्रता का सांस्कृतिक विमर्श

स्वाधीनता का संसार लोकतंत्र है, जिसमें बहुसांस्कृतिकता की ध्वनियां हैं तथा आत्मा की स्वाधीनता के बगैर साहित्य का सृजन संभव नहीं। भौतिक तौर पर कोई पराधीन भी हो परन्तु आत्मिक स्वातंत्र्य ही रचना का हेतु है। यदि आत्मिक स्वातंत्र्य लाया जाय तो भौतिक स्वातंत्र्य व राजनैतिक/सामाजिक स्वातंत्र्य अवश्यम्भावी है। हमारी पूरी सभ्यता, प्रगति हमारी स्वाधीनता पर निर्भर है। स्वतंत्रता का अर्थ बहुवचनात्मकता है, जिसमें अनेक धाराओं का सम्मान है, उनकी बराबरी की इगात हैं।
पराधीनता के रूप बदल गए हंै। वे बड़ी ही बारीकी में रहते हैं। भाषा, संस्कृति, सूचना, रक्षा संबंध, वित्त अनेक रूपों में आ सकते हंै, राजनैतिक पराधीनता तो अलग चीज है ही। अनेक संस्कृतियों व उपसंस्कृतियों में अंतर हो सकता है लेकिन उनके भीतर समंजन के रूप भी होते हैं। संस्कृतियों का आपसी समंजन ही सर्जनात्मकता है। यही बात विश्व को आगे ले जा सकती है। संस्कृतियों व समुदायों के बीच सहअस्तित्व ही दुनिया की स्वाधीनता के प्रति विश्वास दिला सकता है। अपनी संस्कृति से प्यार करना दूसरे से नफरत का तर्क नहीं।
क्या संस्कृति बाधा है या स्वतंत्रता? यह आपके परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है। यह एक ही समय में दोनों हो सकती है। यदि हम इसे संकुचित व बंधे रूप में लें तो यह बंधन बन सकती है, जैसे परंपरा को सही रूप में नहीं लेने पर वह बंधन बन जाती है। यदि इसे व्यापक रूप  दें तथा सबके सम्मान व बराबरी के प्रश्न को प्रमुखता से रखें तो वह स्वाधीनता का आधार बन जाती है। अभिव्यक्ति का होने देना अपने आप में स्वाधीनता है।
इसमें कोई शक नहीं कि पूरी दुनिया में स्वंतत्रता पर खतरे हैं तथा अराजक तत्व संस्कृति के शुभ पक्षों को चुनौती देते रहे हैं। स्वतंत्रता स्थगित करने का कोई तर्क नहीं। किन्तु स्वतंत्रता नाजुक होती है। इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। यह मुफ्त में नहीं मिल सकती है। इसके लिए जागृत बने रहना आवश्यक है। कभी विचारों, कभी जीवन जीने की प्रणाली, कभी असहमति को चंगुल में रखने की कोशिश होती है। कभी किताबें जलाई जाती हैं, कभी सांस्कृतिक प्रतीकों पर हमला होता है।
स्वतंत्रता समझदारी का विषय है। इसमें व्यक्तिगत व सामाजिक स्वतंत्रता दोनों शामिल हैं। व्यक्ति की स्वतंत्रता को सामाजिक स्वतंत्रता के अधीन करने से कई बार वैयक्तिक सृजनशीलता का अंत हो जाता है। दोनों बनी रहनी चाहिए। वैयक्तिक स्वतंत्रता के लिए सामाजिक स्वतंत्रता का वातावरण रहना उचित होगा। स्वतंत्रता लोकतंत्र का ही एक दूसरा रूप है। इसे किसी संविधान में यंत्रवत् नहीं बांधा जा सकता। इसको अनुभव का विषय भी बनाया जाना चाहिए। यह लोक का यथार्थ है। यह लोक का स्वप्न भी है। अधिनायकवाद के विरुद्ध संघर्ष प्रेस का स्वतंत्र होना जरूरी है, वैचारिक स्वाधीनता तो चाहिए ही। इसलिए स्वाधीनता को बचाए रखने के लिए लोकतंत्र व आधुनिक राज्य का होना अपरिहार्य है।
सांस्कृतिक रूप से देखें तो निजता पर प्रभुत्व स्थापित न होने देना स्वाधीनता का आधारभूत लक्षण है। यह एक प्रमुख बात है, जिससे स्वप्न व स्वाभिमान दोनों बने रहते हैं। शक्ति के अनावश्यक विस्तार से भी स्वतंत्रता को खतरा होता है। राष्ट्रीय सीमाओं पर इसे देखा जा सकता है। यह एक कूटनीति से जुड़ा प्रश्न है। कुछ लोग कहते हैं कि समाजों व व्यक्ति के बीच स्वतंत्रता के सम्मान का आधार होना चाहिए तथा सरकार व नागरिक के बीच भी उसके अधिकारों व कर्तव्यों का पक्ष इस तरह हो कि किसी की स्वतंत्रता बाधित न हो। विचारधारा की तानाशाही से भी नागरिकों की स्वतंत्रता बाधित होती है तथा स्वतंत्र सम्मति नहीं आ पाती। यह बेहतर सृजनशीलता का विलोम है। रचनात्मकता का निषेध भी इसे कह सकते हैं। अनेक पार्टियां अपनी धारा को ही उचित मानती हैं तथा अन्यों के उचित होने के उलट सोचती हैं। उन्हें दूसरों के सच को स्वीकार करना चाहिए। इसी में से स्वतंत्रता के यथार्थ व स्वप्न दोनों आएंगे। तकनीक की बढ़ती दखल व विचारों की विविधता की रोशनी में मनुष्य के रिश्तों का सबसे बड़ा आधार स्वतंत्रता है। वह एक मूल्य बन जाता है। स्वतंत्र होना एक सुसभ्य समाज की निशानी है। एक स्वतंत्रमति व्यक्ति सुसंस्कृत माना जाएगा।
स्वतंत्रता एक ऐसा बेहतर आधार है, जहां व्यक्ति व समाजों की क्षमता व इच्छा एकाकार हो जाते हैं। लीक पर चलना भी यथास्थितिवाद की पुष्टि है, उससे अलग हटना ही नवोन्मेषन है। यह एक तरह से स्वंतत्रता का अन्वेषण है। विपथन को सकारात्मक दिशा में ले जाना स्वातंत्र्य कर्म है। स्वतंत्रता को मात्र राजनैतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। आज स्वतंत्रता के आयाम बदल गए हैं। विश्व में चल रहे परिवर्तनों के साथ समुदायों के भीतर उपभेदों, परस्पर विरोधी हितों, इच्छाओं, तनावों, मूल्यों, सांस्कृतिक पक्षों तथा व्यक्तिगत समंजन तक स्वतंत्रता को लक्षित किया जा रहा है।
जब भी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विविध प्रश्न खड़े होंगे: संस्कृति उसके बीचों-बीच होगी।  साम्यवाद व पूंजीवाद दोनों यदि स्वतंत्रता के विरुद्ध होंगे (चाहे वैयक्तिक हो या राजनैतिक) तो स्वंतत्रता के पक्ष में संघर्ष होंगे और हुए हैं। आज सूचना के अंबार में यह देखा जाना आवश्यक है कि सूचनाएं किन माध्यमों से आ रही हैं तथा उनके निहितार्थ व उपपाठ क्या हैं। उनमें ही स्वतंत्रता के रूप तय किए जाने चाहिए। लोकतंत्र का निषेध कर पाना अब किसी व्यवस्था के लिए संभव नहीं है तो सांस्कृतिक माध्यमों से पराधीनता के प्रयत्न जारी हैं। जैसे भाषा, भूषा, सोच, कला व कानून आदि। वास्तविक लोकतांत्रिक संस्कृति व स्वतंत्रता विविध विचारों की सहनशीलता, संचार की स्वतंत्रता व अभिव्यक्ति के प्रसार आदि में निहित है। किसी समूह, भाषा, सांस्कृतिक पक्ष की आवाज न दबाई जाय, यह महत्वपूर्ण है। किसी देश में नस्लवाद न आए, यह देखा जाना चाहिए। कट्टरताएं बढ़ रही हैं, उन्हें रोका जाना चाहिए, बल्कि कहें कि उदारवाद को मजबूत किया जाना चाहिए। सपनों का विरोध पराधीनता को पुष्ट करना चाहिए।
स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है: सहिष्णुता, सजग बौद्धिकता, राजनैतिक उदारता, वैयक्तिकता का सम्मान, धार्मिक समंजन, सांस्कृतिक समशीलता, वैज्ञानिक दृष्टि आदि। स्वतंत्रता को सम्मान देना चाहिए तथा उसके लिए उत्सर्ग हेतु प्रस्तुत भी। राजनैतिक स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है: सांस्कृतिक स्वतंत्रता। सांस्कृतिक प्रश्न मनुष्य व प्राणिमात्र के अधिकारों की सिंथेसिस है। जब असमानताएं व घृणाएं लपलपाने लगें तो साहित्यभाषा भी माकूल नहीं रह जाती। यही सांस्कृतिक अवमूल्यन आता है। हमें बहुसांस्कृतिक नागरिकाता में प्रवेश करके समता व स्वतंत्रता के लिए संघर्षशील बने रहना चाहिए।

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