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विचारकला-साहित्य Alert Star Digital Team Sep 1, 2015 11:47 AM

मातृभाषा पर एक विचार

मातृभाषा पर एक विचार

मातृभाषा पर एक विचार

विश्व का हर व्यक्ति होगा, जिसके पास ऐसी भाषा है जो या तो उसकी है या तो उसके माता-पिता की है या जिसे उसने जन्म से या जीवन में आगे चलकर अपना लिया है। माता-पिता से मिली हुई भाषा यानि मातृभाषा की स्मृतियां और बिंब गहरे होते हैं और प्रभाव बहुत व्यापक। उसमें स्मृति की समूह परकता होती है। किसी जातीय भाषा के बनने की प्रक्रिया के लिए यह समझना जरुरी है कि भाषा और समाज के बीच तीन तत्व विद्यमान होते है: भाषा, समाज और संसर्ग। कोई भी भाषा जैसे ही संसर्ग के साधन का काम करना बंद कर देती है कि वह विकसित होना बंद कर देती है। वह सिर्फ साहित्य में संरक्षित मृत भाषा बन जाती है। जातीय भाषा की विरचना में साहित्यिक मानक की भूमिका और बोल-चाल के रूपों से उसके सहसंबंध का, जातीय भाषा व्यवस्था के सभी तत्वों के विकास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। भाषा का संजातीय कृत्य उसकी जातीय विशिष्ठता में प्रत्येक व्यक्ति के कल्पनापरक चिंतन के अनुकरणीय साहचर्यों में निहित है। जातीय भावना, संजातीय चेतना कई बातों में पैदायशी जुबान पर आधारित होती है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है क्योंकि मनुष्य इसी भाषा मेंं अपनी मां के सबसे पहले शब्दों को सुनता है। यह अकारण नहीं कि विभिन्न जनगण अपनी पैदायशी जबान को अपनी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा से भावात्मक लगाव किसी भाषा के अधिकारों का उल्लंघन होने की स्थिति में जनव्यापी विरोध-प्रदर्शन का स्त्रोत होता है। पैदायशी जबान गैैर जातीय संंस्कृति के संरक्षण और विकास के नारों की जातीय समुदाय में दु्रत अनुक्रिया होती है और वे वर्गीय तथा सामाजिक विरोधों के अस्थाई तौर पर पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं। 1961 के भारतीय जनगणना के मुताबिक मातृभाषा के नाम से 1652 भाषाओं को दर्ज किया गया था। इसमें 17 ऐसी भाषाएं थी, जो केवल एक व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल होती थी, ऐसा उसमें उल्लिखित था। जिनको पहले बोलियां कहते रहे हैं, भाषा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो उनमें साहित्यिक रचना होने के कारण, उनका व्यवहार बढऩे के कारण, फिल्मों में गतिशिलता तथा वैश्विक स्वरूप बनने के कारण कई भाषा कहीं जा सकती हैं। वास्तव में अनेक प्रश्न शेष है। हिन्दी क्या है यह किस संजाति ऐतिहासिक समुदाय की भाषा है- किसी जाति की, जातीय समूह की अथवा जाति में विकसित होते किसी जातीय समूह की? भारत में भाषा के समाज शास्त्रीय पहलू पर यह कह सकते है कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद खड़ी भाषा बालने वाले साहित्यक भाषा को अपना लेते है और पूरी तरह आत्मसात कर लेते हैं, यद्यपि वे अपनी भाषा की बोलीगत रंगत को बनाए रखते हैं। दूसरी ओर दैनंदिन बोली जाने वाली खड़ी बोली की परिधि भी बढ़ रही है, क्योंकि समाज के बहुत से अशंकों के सदस्य शहरों में आ जाने पर अथवा गांव में संसर्ग का परिभाग बढ़ जाने पर अपनी ग्रामीण बोली की जगह अंत:क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा को अपना लेते हैं। इस तरह के संक्रमण में कई क्रमिक मंजिलें होती हैं- ग्रामीण स्थानीक भाषा से शहरी अंतर्भाविक किस्म और फिर मानक भाषा में संक्रमण आता है। इस तरह की संक्रमण में मंजिलों की संख्या, उसकी रफ्तार और व्यक्ति द्वारा अधिक उन्नत, मानक भाषा के आत्मसात किए जाने की भाषा कई कारकों पर निर्भर करती है- सामाजिक तथा सांपत्तिक हैसियत, शिक्षा, पेशा, आयु और अंतत: निजी क्षमता। बोली और साहित्यिक भाषा की अपनी नियम प्रणाली है तो दैनंदिन बोलचाल की जबानों की विशेषता विभिन्नता का ऐसा पैमाना है कि किसी भी नियम अथवा मानदण्ड प्रणाली का अस्तित्व ही संदेहास्पद हो जाता है। कार्यात्मक दृष्टि से खड़ी बोली के निचले रूप एक ही कार्य करते हैं। वे बोलीगत नियम प्रणाली को नष्ट करते और इस तरह से इसकी जमीन तैयार करते हैं कि उनके बोलने वाले दैनंदिन अंत: आंचलिक भाषा के मानदण्डों को आत्मसात करे और साहित्यिक मानक को अंगीकार करें। हिन्दी व्यवस्था की संरचनात्मक जटिलता, उसके अवयवों की विविधता, उनके अन्योन्य संबंधों और कार्यशीलता की विशिष्टता और दो साहित्यिक मानकों की विद्यमानता उस संजातीय-सामाजिक समुदाय के जटिल स्वरूप को प्रतिबिंबित करती है, जिसका हिंदुस्तान की आबादी प्रतिनिधित्व करती है। सुनीति कुमार चटर्जी ने एक बार कहा था कि धनबाद जिले में जो बाडला की धुर पश्चिमी बोली और मैथली की सीमा रेखा पर स्थित है, संताली इन बोलियों द्वारा ही, न कि साहित्यिक भाषाओं द्वारा सहज प्रभावित होती है। संथाल यहां द्विभाषी हैं। घरेलू जरूरतों की संकीर्ण सीमाओं के लिए वे संथाली इस्तेमाल करते हैं और घर के बाहर के सारे मामलों में उन्हें बांग्ला, मैथली, मगधी आदि बाजारी हिन्दी बोलनी पड़ती है। अपने आसपास के बांग्ला भाषी संथाली बोलता है, दोनों ही को शब्दों और रूपों में विशेषकर उन शब्दों में जिन्हें वह आसपास की भाषाओं से अचेतन रूप में ग्रहण करता है, बहुत परिवर्तित होना होता है। बाहरी दुनिया की भाषा अथवा भाषाओं ने घरेलू भाषा के एकात्मक और स्वरुप में अप्रतिकार्य घुसपैठ कर ली है। एक दो पीढियों में संथाल बेहतर बांग्ला के पीछे अपनी संकट संथाली को पूरी तरह से या लगभग भूल जाएगा। जबकि भीतरी भागों की गहराइयों में, जहां संथाल (ऐसी ही स्थिति में स्थिति मुडाओं तथा ओरानों और अन्यों की भांति) बाहरी लोगों के ऐसे घनिष्ठ संपर्क में नहीं है। संथाली फूलती-फलती रहेगी और उसका अस्तीत्व ज्यादा समय तक बना रहेगा। इस प्रकार छोटे पीछड़े जातीय समूहों और कबीलों का प्रशासनिक तथा क्षेत्रीय अलगांव और उसके साथ-साथ दूसरी भाषाएं बोलने वाले पड़ोसियों से संपर्कों का विकास उनकी संजातीय अनन्यता के विघटन और आधारिक संगततीय क्षेत्र से विच्छिन्न हुए समूहों के क्रमिक सभी भवन की ओर ले जाता है। यह प्रक्रिया इन चरणों में चलती है- भाषा संपर्क द्विभाषिता- मातृभाषा विलोप- अंतत: आसपास की आबादी की भाषा में संक्रमण। अमरीकी समाज शास्त्रियों ने आधुनिक कृषि प्रविधियों का संबंधित करने में रेडियों और पे्रस की कारगरता का आकलन करने के लिए कर्नाटक में कई गांवों का सर्वेक्षण किया और तीन सौ कृषक परिवारों से पूछताछ की। उनकी पूछताछ से साथ ही यह बात भी सामने आई है कि राष्ट्रीय एकीकरण की अपीलें उत्तरदाताओं में अपेक्षाकृत अनुक्रिया नहीं पैदा करती थी। जबकि स्थानीय समस्याओं में वे अत्यंत सजीव दिलचस्पी जताते थे। इसके अलावा अधिकांश उत्तरदाताओं ने प्रश्नावली में उल्लेखित आत्मिक मूल्यों में सबसे महत्वपूर्ण अपनी मातृभाषा को बतलाया है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों की अन्य स्त्रोतों से भी पुष्टि होती है। इसी तरह जहां तक भोजपुरियों की बात है तो न सिर्फ यहां कि उनके यहां कोई इतिहास निर्मित केन्द्र नहीं है (प्रमुखत: बनारस या गोरखपुर मान सकते हैं) बल्कि वे प्रशासनीक सीमाओं द्वारा बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश आदि राज्यों के बीच विभाजित भी है। भोजपुरी ने अमुमन हिन्दी, खड़ी बोली के अहित में अब तक कोई कदम नहीं उठाया है। यह उसकी समंजन दृष्टि का परिचायक है। एनवी वैद्य कहते है कि हिन्दी एक ऐसी भाषा व्यवस्था (संरचना) के रूप में सामने आती है, जिसके विभिन्न तथ्य धनिष्टत: जुड़े हुए हैं और अपने बीच अन्योन्य क्रिया करते हैं। मातृभाषा का सवाल अपनी सांस्कृतिक चेतना को गति देने उसे प्रकट करने अपनी रचनात्मकता को सही रूप सम्मानित होने, अन्य विभिन्न भाषा-भाषियों द्वारा उसके लिए उचित सामाजिक राजनैतिक प्रशासनिक स्पेस बनाने से गहरा जुड़ा है।

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