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पहाड़ है मांझी नहीं
केतन मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म 'मांझी : द माउंटेन मैनÓ चर्चा में है। इस पर समीक्षा, दर्शकों की प्रतिक्रिया तथा निर्देशक व फिल्म के मुख्य किरदार के साक्षात्कार से फिल्म का एक महत्वपूर्ण आयाम इस रूप में प्रस्तुत हुआ है कि यह फिल्म मूलत: दशरथ मांझी के जीवन-वृत्त पर आधारित है, जिसके केन्द्र में उनका ऐतिहासिक कार्य पहाड़ काटकर रास्ता बनाना है। इस तरह यह फिल्म फिक्शन की श्रेणी में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्ति के जीवन-वृत्त पर आधारित फिल्म के रूप में प्रस्तुत हुई है। अंग्रेजों के एक प्रतिष्ठित अखबार में यह खबर है कि इस फिल्म को देखने के बाद दशरथ मांझी के बेटे और पोते को यह संतोष और गौरव महसूस हुआ कि 'बाबा पर बनी फिल्म आने वाली पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व व उपलब्धि को याद दिलाती रहेगी।Ó इसी तरह, सिनेमा-जगत और राजनीति दोनों क्षेत्रों में दखल रखने वाले शत्रुघ्न सिन्हा की टिप्पणी है कि 'बिहार का डीएनए क्या है, यह कोई इस फिल्म से जान सकता है। यह फिल्म केवल दर्शकों का मनोरंजन नहीं करती है, बल्कि बिहार की सही तस्वीर सामने लाती है।Ó इस परिप्रेक्ष्य में और भी टिप्पणियां जोड़ी जा सकती हैं। असल में, इस फिल्म पर यहीं से कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं- क्या इस फिल्म में निर्देशक ने दशरथ मांझी के कृतित्व व व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की ईमानदार कोशिश की है? उसने जिस दृष्टिकोण से पटकथा लिखी है और फिल्म के किरदार ने जिस तरीके से खुद को प्रस्तुत किया है, क्या उसमें दशरथ मांझी के कृतित्व व व्यक्तित्व की थोड़ी भी झलक है? और यह भी कि फिल्म के निर्देशक केतन मेहता दशरथ मांझी के उबड़-खाबड़ जीवन-वृत्त को समझने में आखिर क्यों विफल हो जाते हैं? फिल्म की पटकथा से स्पष्ट है कि केतन मेहता कला और व्यवसाय में तालमेल बैठाना चाहते हैं। फलत: यह फिल्म बंबइया फिल्म के चलताऊ फ्रेमवर्क की गिरफ्त में आ जाती है। महंगी बजट वाली बंबइया फिल्मों में अमीरी दिखती है, ग्लैमर दिखता है, और रंगीन दृश्यावलियां दिखती हैं। 'मांझी : द माउंटेन मैनÓ में गरीबी दिखती है, पहाड़ और पथरीली जमीन दिखते हैं और जातीय व आर्थिक तनाव दिखते हैं। ऊपरी तौर पर देखने पर आम बंबइया फिल्म और इस फिल्म में कथानक और प्लॉट का फर्क है। लेकिन जैसे ही हम इस फिल्म को एक गंभीर दर्शक और समीक्षक के दृष्टिकोण से, आलोचनात्मक नजरिए से देखते हैं तो फिल्म के कथानक एवं प्लॉट में कई बुनियादी समानताएं हैं। एक फार्मूला बंबइया फिल्म की यह मजबूरी है कि वह फिल्म के मुख्य किरदार को रॉबिनहुड के किरदार के रूप में नवाजुद्दीन हैं और निर्देशक और दृष्टिकोण से ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में दशरथ मांझी। फार्मूला फिल्मों की कहानियां आमतौर पर प्रेम से शुरू होती हैं और प्रेम से खत्म होती है। निर्देशक ने इस फिल्म में भी ऐसा ही किया है। इतना ही नहीं, निर्देशक की नजर में दशरथ मांझी का अपनी पत्नी से प्रेम उसी श्रेणी का है जिस श्रेणी का प्रेम शाहजहां का मुमताज से है। इसी तरह, निर्देशक की नजर में पहाड़ काटने का मूल प्रेरणास्रोत दशरथ मांझीकी पत्नी-प्रेम था। ऐसी फार्मूला फिल्मों की पटकथा बिना बलात्कार-दृश्य के खत्म नहीं होती हैं और इस 'मांझी : द माउंटेन मैनÓ फिल्म में भी यह मसाला डाला हुआ है। आमतौर पर बंबइया फिल्में गांव को एक स्थिर समाज के रूप में प्रस्तुत करती हैं और यह फिल्म भी इसका अपवाद नहीं है। लेकिन इसके उलट जब भी दशरथ मांझी से उनके उल्लेखनीय कार्य पहाड़ काटकर रास्ता बनाने के बारे मे ंसवाल किया जाता था तो वे प्राय: कबीरपंथी शैली में कहते थे- ''मैंने वह काम किया जिसे आज तक किसी ने नहीं किया था। सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग सब बीते; धनवाले, बल वाले, विद्यावाले, गरीब जन्मते रहे, मरते रहे लेकिन रास्ता बनाने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। इस इलाके में 1200 बीघे के जमींदार हैं, वे हाथी पर चलते थे। उन्हें लगता था, हम सब लोगों से ऊंचा हैं। जब वे पहाड़ के नीचे आते थे तो अपनी असली स्थिति से परिचित होते थे। उन्हें हाथी से नीचे उतरना पड़़ता था। वे संकरे रास्ते से उस पार जाते थे, फिर उस पार जाकर उस हाथी पर सवार होते थे।ÓÓ दशरथ बाबा उनके बारे में कहते थे, ''उनके पास धन तो था, मन न था। इसलिए पहाड़ न कटा। पहाड़ को काटने के लिए पहाड़ से छह फीट ऊंचा होना पड़ेगा। असल धन है मन।ÓÓ यह दशरथ मांझी का केवल एक वक्तव्य नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा पाठ है जो उनकी प्रेरणा का स्रोत है और कबीरपंथी विचारधारा को प्रस्तुत करता है। हाल के दशक में ऐसे शोध भी उपलब्ध हैं जो न केवल दशरथ मांझी को समझने की सामग्री प्रदान करते हैं, बल्कि उस समुदाय, जिससे दशरथ जी आते हैं, को भी समझने की एक अर्थपूर्ण समझ देते हैं। इनमें दो पुस्तकें खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। पहली है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित ज्ञान प्रकाश की पुस्तक बांडेड डिस्ट्रीज: जिनियालॉजी ऑफ लेबर सर्विट्यूट इन कॉलोनियन इंडिया और दूसरी है देशकाल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित असर्टिंग वायसेज : चेंजिग कल्चर, आइडेंटिटी एंड लाइवलीहुड ऑफ द मुसहर्स इन द मिड्ल गंगेटिक प्लेन्स। ये शोध हमें यह भी अन्तदृष्टि देते हैं कि दशरथ मांझी का यह महान कार्य एक स्थानीय परिप्रेक्ष्य में भले घटा हो और इनके 22 वर्षों के अथक प्रयास से एक रास्ता बना हो, लेकिन बड़े संदर्भ में दशरथ मांझी के कथन तथा विचार से यह इंगित होता है कि बिहार में दलित राजनीति के केन्द्र में दलितों में दलित मानेजाने वाले मुसहर समुदाय की राजनीति में बढ़ती हुई सक्रियता तथा राजनीति की मुख्यधारा को दिशा देने की ताकत दशरथ मांझी द्वारा मुसहर समुदाय में सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए किए गए कार्य का ही नतीजा हैा। इस तरह दशरथ मांझी का कृतित्व व व्यक्तित्व एकआयामी नहीं, बहुआयामी है। इनके द्वारा किया गया महान कार्य- पहाड़ काटकर रास्ता बनाना- उनके जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं (जैसे मुसहर समुदाय का सुधार, कबीरपंथी विचारधारा का प्रचार और ब्राह्मणवाद का विरोध) से परस्पर जुड़ा हुआ है, अंतर्संबंधित है। निर्देशक के समुचित दृष्टिकोण के पूर्णत: अभाव के कारण इस फिल्म में एक इतिहास-पुरुष, मिथ बन जाता है; एक समाज सुधारक, रॉबिनहुड के रूप में प्रस्तुत होता है; एक ज्ञानी कबीरपंथी, निरक्षर के रूप में आता है और मुसहर समुदाय, चूहा खाने वाली जाति के रूप में प्रस्तुत होता है। इस तरह दशरथ मांझी के आत्मवृत्त को निर्देशक केतन मेहता जिस तरह प्रस्तुत करते हैं, उसमें एक तोड़-मरोड़कर फिक्शनल दशरथ मांझी प्रस्तुत होते हैं। और इस दृष्टिकोण के कारण ही दशरथ मांझी उनके लिए 'अन्यÓ की श्रेणी में है। नतीजा है कि आधुनिक युग का सबसे सशक्त माध्यम फिल्म, जो बहुत ही प्रभावशाली और व्यापक पहुंच वाला माध्यम है, दशरथ मांझी का अतीत वर्चस्वशाली कथानक और कल्पनाशीलता का हिस्सा बन गया है। फलत: फिल्म में दशरथ मांझी के महान कार्य का भूगोल (बीच से कटा पहाड़ और रास्ता) बार-बार दिखता है लेकिन उनका अतीत और इतिहास पूर्णत: अनुपस्थित है।
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