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चीन और भारत कोयले से बिजली बनाएं या दुनिया की आबोहवा बचाएं?
भारत समेत पूरी दुनिया ऊर्जा संकट का सामना कर रही है. भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयले का कुछ ही दिनों का स्टॉक बचा है. हालांकि सरकार ने भरोसा दिलाया है कि संकट जैसी स्थिति नहीं पैदा होने वाली है.
लेकिन दूसरी तरफ़, दुनिया भर में ब्लैक आउट के ख़तरे से जुड़ी रिपोर्टें आ रही हैं. कुछ दिनों पहले चीन में ब्लैक आउट की स्थिति देखी गई थी और भारत के लिए भी ऐसी आशंका जताई जा रही है.
ये संकट कई महीनों से धीरे-धीरे बढ़ रहा है. कोरोना महामारी के बाद अर्थव्यवस्था में आई तेज़ी से ऊर्जा खपत में अचानक बढ़ोतरी हुई है और बिजली की मांग बढ़ी है. लेकिन, कोयले का उत्पादन उस स्तर पर ना होने से कोयले की कमी हो गई है.
बीते दो महीनों में ही बिजली की ख़पत 2019 के मुकाबल में 17 प्रतिशत बढ़ गई है. इस बीच दुनिया भर में कोयले के दाम 40 फ़ीसदी तक बढ़े हैं जबकि भारत का कोयला आयात दो साल में सबसे निचले स्तर पर है.
चीन में भी लगभग यही स्थिति बनी हुई है और वो अपनी कोयले की खदानों में उत्पादन बढ़ा रहा है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक अंदरूनी मंगोलिया में 70 से ज़्यादा कोयले की खदानों में 100 मिलियन टन उत्पादन बढ़ाने के आदेश दिए गए हैं.
ये हालात ऐसे समय में बने हैं जब भारत और चीन दोनों ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रहे हैं और अक्टूबर-नवंबर में 26वां जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होने वाला है.
पेरिस समझौते के मुताबिक भारत 2030 तक कार्बन उत्सर्जन 33-35 प्रतिशत तक कम करेगा और नवीकरणीय ऊर्जा को 175 गीगावॉट तक बढ़ाएगा.
लेकिन, मौजूदा स्थिति फिर से कोयले की तरफ़ झुकाव को बढ़ा रही है. बिजली के लिए नवीकरणीय ऊर्जा या प्राकृतिक गैस पर पूरी तरह निर्भरता अभी संभव नहीं है. फिलहाल कोयले का उत्पादन बढ़ाने और बंद हो चुकीं खदानों को खोलने पर ज़ोर दिया जा रहा है.
वहीं, जलवायु परिवर्तन से जुड़े अपने लक्ष्य भी हैं जिनके लिए भारत ने प्रतिबद्धता जताई है.
पेरिस जलवायु समझौते का लक्ष्य दुनिया का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना है और उसे 1.5 डिग्री पर ही रोक देना है. नवंबर में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन भी होने वाला है.
तो क्या भारत को जलवायु परिवर्तन के अपने लक्ष्यों पर फिर से सोचने की ज़रूरत है? क्या कोयले की मौजूदा ज़रूरत से कार्बन उत्सर्जन घटाने की वैश्विक कोशिशों को धक्का लग सकता है?
भारत के ऊर्जा उत्पादन में कोयले की भागीदारी 70% है
जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य दीर्घकालिक
जानकार मानते हैं कि ये संकट थोड़े समय के लिए और इसका जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वो दीर्घकालिक होते हैं. लेकिन, कोयले छोड़ना इतना आसान भी नहीं होने वाला है.
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरंमेंट में प्रोग्राम डायरेक्टर स्रमाट सेन गुप्ता कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन के लिए कोयले की खपत कम करने का जो लक्ष्य रखा गया है उसे पूरा करने में कोई समस्या नहीं आएगी. अभी जो संकट है उसकी मुख्य वजह भंडारण ठीक से ना करना है. इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोयले की कमी का भी असर है."
"पिछले कुछ सालों से वैश्विक स्तर पर कोयले को छोड़ने पर ज़ोर दिया जा रहा है. लेकिन, ऊर्जा संसाधनों में जो ये बदलाव होगा वो एक-दो साल की बात नहीं है. इसमें 20 से 25 सालों का समय लगेगा. फिर अगर इस साल कोयला उत्पादन में तेज़ी आ रही है तो उसका स्तर महामारी से पहले का ही है. महामारी से पहले के कुछ सालों में भी इतना ही उत्पादन हुआ है और अब कोयले का उत्पादन अचानक बढ़ने नहीं जा रहा है."
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के एसोसिएट डायरेक्टर नितिन बंसल मानते हैं कि कोयला छोड़ना तो आसान नहीं है लेकिन जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों पर मौजूदा स्थिति का खास प्रभाव नहीं पड़ेगा.
नितिन बंसल कहते हैं, "इस साल बिजली की जो मांग बढ़ी है ज़रूरी नहीं कि वो अगले साल भी हो. एक-दो प्रतिशत मांग हर साल बढ़ती है लेकिन उसके लिए सरकारें तैयार रहती हैं. आने वाले समय में ऊर्जा ज़रूरतें पहले के स्तर पर आ जाएंगीं. ऐसे में सरकार नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाने से लेकर कोयले पर निर्भरता कम करने के लक्ष्य पर आगे साल काम कर सकती है."
नितिन बंसल के मुताबिक सर्दियों में बिजली की खपत कम होगी और कोयले का उत्पादन बढ़ेगा तो मांग और आपूर्ति में संतुलन आ जाएगा. हालांकि, कोयले का उत्पादन बढ़ाना एक चुनौती है क्योंकि घरेलू उत्पादन पर दबाव बहुत बढ़ गया है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कोयले के दाम भी काफ़ी बढ़े हुए हैं.
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