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समाचारदेश Alert Star Digital Team Sep 19, 2023 09:17 PM

केजरीवाल के बंगले के रेनोवेशन मामले में हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

केजरीवाल के बंगले के रेनोवेशन मामले में हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

केजरीवाल के बंगले के रेनोवेशन मामले में हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने मंगलवार को उन छह पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने के एकल पीठ के आदेश पर फैसला सुरक्षित रख लिया जिन्हें मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Delhi CM Arvind Kejriwal) के आधिकारिक आवास के रेनोवेशन में नियमों के कथित घोर उल्लंघन पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था।

दिल्ली हाईकोर्ट की डबल बेंच में एकल पीठ के उक्त आदेश चुनौती दी गई थी।

सतर्कता निदेशालय ने उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के 15 सितंबर के अंतरिम आदेश को रद्द करने की मांग की थी। सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि 12 अक्टूबर तक याचिकाकर्ता पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के खिलाफ किसी भी प्राधिकारी की ओर से कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। सतर्कता निदेशालय की अपील मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव नरूला की खंडपीठ के समक्ष आई थी। अब इस खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

दरअसल, एकल न्यायाधीश ने अधिकारियों द्वारा संयम बरतने में विफल रहने पर गंभीर आपत्ति जताते हुए अंतरिम आदेश पारित किया था। अदालत ने कहा था कि अधिकारियों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। सतर्कता निदेशालय ने वकील योगिंदर हांडू के जरिए दायर अपील में दलील दी गई थी कि सिंगल बेंच ने उक्त आदेश इस तथ्य को जाने बिना पारित किया था कि कथित आश्वासन बिना किसी सक्षम प्राधिकारी के आए थे।

एकल न्यायाधीश ने कारण बताओ नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया था। बता दें कि सतर्कता निदेशालय ने केजरीवाल के आधिकारिक आवास के नवीनीकरण में नियमों के कथित उल्लंघन पर छह पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। संबंधित मुख्य अभियंताओं और अन्य पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को जारी नोटिस में उनसे अपने कार्यों की व्याख्या करने को कहा गया था।

एकल पीठ ने उक्त छह अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई की थी। अधिवक्ता मोहित माथुर के जरिए यह याचिका दाखिल की गई थी। यचिका में विशेष सचिव (सतर्कता) की ओर से 19 जून को जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द करने की मांग की गई थी। इसके पक्ष में दलील दी गई थी कि शीर्ष अधिकारी ने यह नोटिस अधिकार क्षेत्र से परे जारी किया था। इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए बंद दिमाग से जारी किया गया था।

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