होम “लातों के भूत हैं, बातों से मानेंगे नहीं”, मुहर्रम, सावन और कांवड़ यात्रा को लेकर सीएम योगी का तीखा बयान
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में एक कार्यक्रम के दौरान मुहर्रम और सावन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने जौनपुर में मुहर्रम के दौरान ताजिया की ऊंचाई के चलते हुए हादसे का ज़िक्र करते हुए कहा —
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में एक कार्यक्रम के दौरान मुहर्रम और सावन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने जौनपुर में मुहर्रम के दौरान ताजिया की ऊंचाई के चलते हुए हादसे का ज़िक्र करते हुए कहा —
"मैंने पुलिस से कहा कि लाठी मार कर के बाहर करो इनको क्योंकि ये लातों के भूत हैं. बातों से मानेंगे नहीं."
यह बयान उस घटना के बाद आया है जब जौनपुर में एक ताजिया हाई टेंशन लाइन की चपेट में आ गया था, जिससे तीन लोगों की मौत हो गई थी और फिर हंगामा और सड़क जाम हुआ। मुख्यमंत्री के मुताबिक, इस घटना के बाद उन्होंने सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।
सीएम योगी ने कहा कि,
"मुहर्रम का हर जुलूस उत्पात, आगजनी और तोड़फोड़ का कारण बनता था।"
वहीं उन्होंने सावन और कांवड़ यात्रा को "एकता का अद्भुत संगम" बताया। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान कोई अव्यवस्था नहीं होती, जबकि कुछ लोग जानबूझकर धार्मिक आयोजनों को भड़काने का काम करते हैं।
कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर फेक अकाउंट बनाकर जातीय संघर्ष भड़काने की साजिश कर रहे हैं। उन्होंने एक पुरानी घटना का हवाला देते हुए बताया कि एक आगजनी की घटना में भगवा गमछा ओढ़े एक व्यक्ति ने “या अल्लाह” कहा था, जिससे उसकी मंशा साफ हो गई थी।
उन्होंने कहा कि ऐसे शरारती तत्वों की पहचान करना बेहद जरूरी है जो समाज को बांटने की कोशिश करते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि "आज कांवड़ यात्री भक्ति भावना से चलते हैं... 200, 300, 400 किलोमीटर पैदल चलकर हर-हर बम बोलते हुए आते हैं।"
फिर भी मीडिया में उनका ट्रायल किया जाता है, उन्हें उपद्रवी और आतंकवादी तक कहा जाता है।
"यह वही मानसिकता है जो भारत की आस्था और विरासत का अपमान करती है," सीएम ने कहा।
कार्यक्रम के दौरान भगवान बिरसा मुंडा पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोलते हुए सीएम योगी ने कहा कि भारत का जनजातीय समाज हर संकट में सनातन धर्म की रक्षा के लिए सबसे आगे रहा है। उन्होंने कहा कि वेदों की ऋचाएं राजमहलों में नहीं, बल्कि जंगलों में लिखी गईं, और हर प्राचीन ग्रंथ में अरण्यकांड का ज़िक्र मिलता है।
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