होम न डील न जीत, फिर क्यों पीछे हट रहे ट्रंप? ईरान युद्ध के बीच अमेरिका की बदली रणनीति ने बढ़ाए सवाल

समाचारविदेश Alert Star Digital Team Apr 1, 2026 07:00 PM

न डील न जीत, फिर क्यों पीछे हट रहे ट्रंप? ईरान युद्ध के बीच अमेरिका की बदली रणनीति ने बढ़ाए सवाल

मिडिल ईस्ट में जारी अमेरिका-ईरान युद्ध को लगभग पांच हफ्ते पूरे होने जा रहे हैं और इसी बीच अमेरिका की रणनीति में बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि अमेरिका अपने सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को जल्द समाप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है।

न डील न जीत, फिर क्यों पीछे हट रहे ट्रंप? ईरान युद्ध के बीच अमेरिका की बदली रणनीति ने बढ़ाए सवाल

मिडिल ईस्ट में जारी अमेरिका-ईरान युद्ध को लगभग पांच हफ्ते पूरे होने जा रहे हैं और इसी बीच अमेरिका की रणनीति में बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि अमेरिका अपने सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को जल्द समाप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि अब तक युद्ध में वह लक्ष्य हासिल होते नहीं दिखे, जिनकी उम्मीद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे थे। न दोनों देशों के बीच कोई समझौता हुआ, न स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल पाया और न ही ईरान ने किसी तरह का सरेंडर किया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका मजबूरी में युद्ध से पीछे हट रहा है।

NATO पर ट्रंप का बड़ा बयान

हाल ही में डेली टेलीग्राफ को दिए एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह अमेरिका को NATO से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से कई सहयोगी देश दूरी बनाते नजर आए हैं।

ट्रंप ने इंटरव्यू में NATO को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, 'ओह हां, मैं कहूंगा कि यह पुर्विचार से परे है.'

इसके साथ ही उन्होंने कहा, 'मैं नाटो से कभी भी प्रभावित नहीं हुआ. मुझे पता था कि वे एक कागजी शेर हैं. पुतिन भी यह बात जानते हैं.'

सहयोगी देशों ने नहीं दिया साथ

मिडिल ईस्ट संकट के दौरान अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। यूके, स्पेन, इटली, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने इस युद्ध में सीधे शामिल होने से दूरी बना ली। कुछ देशों ने तो अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस पर उतरने की अनुमति तक नहीं दी।

ब्रिटेन ने स्पष्ट कर दिया कि वह इस युद्ध का हिस्सा नहीं बनेगा और केवल अपने हितों की रक्षा के लिए क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य और वायु रक्षा तैनाती करेगा।

हथियारों का घटता भंडार बना चिंता

अमेरिकी रक्षा दस्तावेजों के अनुसार अमेरिका के टॉमहॉक क्रूज मिसाइल भंडार पर भी दबाव बढ़ता दिख रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के पास कुल 3,992 टॉमहॉक मिसाइलें हैं और ईरान के खिलाफ एक महीने में लगभग 850 मिसाइल दागी जा चुकी हैं। औसत के आधार पर देखा जाए तो मौजूदा स्टॉक करीब 3.7 महीनों तक ही चल सकता है।

लगातार सैन्य अभियान के कारण हथियारों की खपत और रक्षा संसाधनों पर दबाव बढ़ना भी रणनीति बदलने की बड़ी वजह माना जा रहा है।

बढ़ता युद्ध खर्च और आर्थिक दबाव

रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका इस युद्ध पर रोजाना करीब एक अरब डॉलर खर्च कर रहा है। पिछले एक महीने में कुल सैन्य खर्च 36 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला है।

द वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के सहयोगियों ने माना है कि फिलहाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलना प्राथमिकता नहीं है, क्योंकि इससे सैन्य अभियान और लंबा खिंच सकता है। इसी वजह से अमेरिका अब युद्ध को जल्दी खत्म करने पर ज्यादा जोर देता दिख रहा है।

बातचीत भी नहीं लाई नतीजा

युद्ध खत्म कराने के लिए मध्यस्थता की कोशिशें भी सफल नहीं हो सकीं। ईरान ने अमेरिका की 15 सूत्रीय मांगों को एकतरफा बताते हुए खारिज कर दिया। इससे कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ गईं और युद्ध लंबा खिंचने का खतरा बढ़ गया।

ईरान को भी भारी नुकसान

दूसरी ओर इस युद्ध में ईरान को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कई शीर्ष सैन्य अधिकारी और सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। ईरानी रेड क्रिसेंट के अनुसार US-इजरायली हमलों में देशभर में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है।

जानकारी के अनुसार 90,063 रिहायशी इकाइयां, 307 स्वास्थ्य एवं मेडिकल सुविधाएं और 760 स्कूल प्रभावित हुए हैं। वहीं लगभग 20,880 लोग घायल बताए जा रहे हैं।

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