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यूथशिक्षा Alert Star Digital Team Aug 4, 2022 10:30 PM

प्रभु की इच्छा सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने की है!

प्रभु की इच्छा सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने की है!

प्रभु की इच्छा सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने की है!

-डॉ. जगदीश गांधी, संस्थापक-प्रबन्धक,

 सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) परमात्मा ने कृष्ण को संसार में  क्यों भेजा?

                जब मनुष्यों के जीवन में निपट भौतिकता बढ़ जाने के कारण अन्याय की भावना प्रवेश कर गई और मानव जीवन दुःखी हो गया तब दयालु परम पिता परमात्मा ने न्याय आधारित मानव समाज बनाने के लिए धरती पर भगवान कृष्ण को भेजा। राजा यदि खुद ही अन्यायी हो तो सारा समाज अन्यायी होकर विकृत हो जाता है। कृष्ण ने जब भीष्म पितामह से दुर्योधन के पापों की शिकायत की तो भीष्म पितामह बोले हाँ कृष्ण मैं भी दुर्योधन के पापों से बहुत दुःखी हूँ। कृष्ण बोले तब महाराज आप पापी कौरवों का साथ क्यों दे रहे हैं? आप पाण्डवों के साथ आकर न्याय का साथ दें। भीष्म पितामह बोले कृष्ण तुम जानते नहीं कि मैंने हस्तिनापुर राज्य की रक्षा की प्रतिज्ञा की है। भीष्म प्रतिज्ञा अटल है। मैं हस्तिनापुर की रक्षा करूँगा अब चाहे भगवान भी सामने आ जायें तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा।

(2) केवल प्रभु इच्छा का कार्य ही करें:-

                भगवान कृष्ण ने भीष्म पितामह से कहा कि महाराज जबसे यह सृष्टि परमात्मा ने बनाई है तब से परमात्मा ने मनुष्य के लिए एक ही धर्म (या कर्त्तव्य) निर्धारित किया है और वह यह है कि मनुष्य प्रभु इच्छा को जाने एवं उस पर चले। वह अपनी इच्छा का कार्य नहीं बल्कि केवल प्रभु इच्छा का कार्य ही करें। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी का केवल एक ही धर्म या कर्त्तव्य है कि वह संसार के समस्त प्राणी मात्र के व्यापक हित को ध्यान में रखकर अपने निर्णय लें। अर्थात वह ऐसा निर्णय ले जो सम्पूर्ण समाज को सुसंगठित करने वाला हो, उनमें आपसी एकता स्थापित करने वाला हो एवं धर्म परायण, न्यायपूर्ण या कर्त्तव्य परायण बनाने में सहयोगी बनाने वाला हो न कि समाज की व्यवस्था को बिगाड़ने वाला। 

(3) मनुष्य का केवल एक ही धर्म है:-

                महाभारत के युद्ध में आप देखंे कि अर्जुन तो कौरवों से युद्ध करना ही नहीं चाहते थे। महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन के अंदर भयंकर रूप से यह द्वन्द्व चल रहा था कि मैं युद्ध करके अपने पूज्य पितामह, गुरू द्रोणाचार्य, भाई, कर्ण जैसे दानी और कौरवों की सेना में खड़े अपने सगे चाचा, मामा, ताऊ आदि नाते-रिश्तेदारों को कैसे मारूँ? यह तो धर्म के विरूद्ध होगा। कौरव-पाण्डव की सेनाओं के बीच खड़ा होकर अर्जुन कृष्ण से बहुत तर्क-वितर्क करते हुए कह रहे थे कि कृष्ण आप मुझे अपने नाते-रिश्तेदारों से युद्ध करके इतना बड़ा नरसंहार करने के लिए क्यों कह रहे हैं? यह कौन-सा धर्म है? इतना खून बहाना तो धर्म विरूद्ध होगा। कृष्ण ने मुँह खोलकर उसे तीनों लोकों का यह ज्ञान करा दिया कि मनुष्य का केवल एक ही धर्म है और वह यह है कि मनुष्य प्रभु इच्छाओं को जाने और उन पर चले।

(4) प्रभु की शरण में जाते ही हम सब युद्ध खुद ही जीत जाते हैं: - 

                गीता के 18वें अध्याय में 73वें श्लोक के अनुसार कृष्ण के समझाने के बाद अर्जुन कहते हैं - हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति यानि ज्ञान प्राप्त हो गया है। अब मैं संदेह रहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूगंा। इस प्रकार ईश्वरीय इच्छा का पालन करने के लिए युद्ध करने का निर्णय करके अर्जुन संत बन गये और ईश्वर भक्त कहलाये। जबकि भीष्म पितामह, गुरू द्रोणाचार्य, कर्ण जैसे दानी, धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन अपने मन की करने के कारण अधर्म का साथ देने के दोषी बन गये। कृष्ण ने अर्जुन को तीनों लोकों का एक ही ज्ञान कराया कि प्रभु इच्छा के आगे अपनी इच्छा को महत्व नहीं देना चाहिए। अर्जुन यदि अपने हृदय को प्रभु के प्रति शरणागत होकर पवित्र न करते तो अपने अंदर के द्वन्द्व को जीतकर युद्ध का निर्णय नहीं ले पाते।

(5) हमें भी अपने मन की नहीं बल्कि प्रभु के मन की करनी चाहिए:-

                यदि अर्जुन परमात्मा की शरण में न जाते और महाभारत का युद्ध न करते तो आज समाज की क्या स्थिति होती? यदि राम अपने पिता का त्याग कर प्रभु इच्छा के पालन के लिए वन को न गये होते और यदि माता सीता अपने पति की इच्छा का उल्लंघन कर प्रभु प्रेम के लिए वन न गई होती तो समाज की क्या स्थिति होती? शायद आज सम्पूर्ण समाज मर्यादा विहीन बन गया होता और सर्वत्र रावण जैसे दबंग एवं मर्यादाविहीन व्यक्तियों का राज होता। इसलिए हमें भी अपने मन की नहीं बल्कि प्रभु के मन की करनी चाहिए। प्रभु का मन हमेशा से समस्त प्राणी मात्र का कल्याण रहा है तो ऐसे में विश्व के प्रत्येक मनुष्य को  भी सारी सृष्टि के प्राणी मात्र के कल्याण के लिए ही काम करना चाहिए, ताकि परमात्मा का बनाया व्यापक समाज सुव्यवस्थित हो सके।

(6) सर्व धर्म समभाव की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है:-

                परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में भेजे गये महान अवतारों राम (7500 वर्ष पूर्व), कृष्ण (5000 वर्ष पूर्व), बुद्ध (2500 वर्ष पूर्व), ईसा मसीह (2000 वर्ष पूर्व), मोहम्मद साहब (1400 वर्ष पूर्व), गुरू नानक देव (500 वर्ष पूर्व) तथा बहाउल्लाह (200 वर्ष पूर्व) धरती पर अवतरित हुए हैं। स्कूलों के माध्यम से संसार के प्रत्येक बालक को राम की मर्यादा, कृष्ण का न्याय, बुद्ध का सम्यक ज्ञान, ईशु की करूणा, मोहम्मद साहेब का भाईचारा, गुरू नानक का त्याग और बहाउल्लाह की हृदय की एकता की शिक्षाओं का ज्ञान कराया जाना चाहिए। साथ ही विश्व के प्रत्येक बालक को विश्व एकता के अन्तर्गत वसुधैव कुटुम्बकम्, जय जगत तथा सर्व धर्म समभाव की शिक्षा देकर पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनाना चाहिए। मानव सभ्यता का अन्तिम लक्ष्य संसार में आध्यात्मिक स्थापना करना है।

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